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*दादू मैं दासी तिहिं दास की, जिहिं संगि खेलै पीव ।*
*बहुत भाँति कर वारणें, तापर दीजे जीव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मगण महोदधि है भर्यो, जन पूजत डरपे ।*
*वह गंभीर गहरो भर्यो, यह तुछ जल अरपे ॥*
*रति इक किरची१ कंचन की, ले मेरहिं परसे२ ।*
*देखत नजर न ठाहरै, कंचन मय दरसे ॥*
*जैसे सुर तरु को ध्वजा, रचि३ पचि४ अरपे नैक५ नर ।*
*त्यूं रघवा इत पूजक है, उत हरि जन त्रय ताप हर ॥२०॥*
समुद्र में स्नान करनेवाला भावुकजन समुद्र में निमग्न होकर अर्थात् स्नान करके भरे हुये समुद्र से ही एक अंजलि रूप अति थोड़ा जल लेकर समुद्र के समर्पण करता है, किन्तु वह समुद्र तो अथाह अति गहरा भरा हुआ है, उसे उस अंजलि की क्या आवश्यकता है ? वह तो भक्त का भाव ही है ।
एक रती भर स्वर्ण का टुकड़ा१ लेकर यदि कोई सुमेरु के पास जाय२ तो उसे देखते ही वह स्वर्ण रूप दीखेगा और उसकी दृष्टि उस पर नहीं टिक सकेगी । कारण-सूर्य की किरण पड़ने से वह अत्यधिक चमकता रहता है ।
तथा जैसे कोई नर बहुत परिश्रम४ करके चतुरता के साथ बनाकर३ छोटी-सी५ ध्वजा कल्प वृक्ष के समर्पण करे तो उससे कल्पवृक्ष की क्या उन्नति होगी? उसके नीचे तो संकल्प करने मात्र से इच्छानुसार सभी पदार्थ प्राप्त होते हैं । वैसे ही इधर मैं राघवदास तो पूजक और उधर त्रयताप को नष्ट करने वाले हरि भक्त-पूज्य हैं । उनका और मेरा सम्बन्ध उक्त उदाहरणों के समान ही है अर्थात् मैं उनका यश भक्तमाल में कहूँगा उससे तो उन का यश अत्यधिक है फिर भी मैं जितना कह सकूंगा उतने से ही मुझे संतोष हो ही जायगा ।
(क्रमशः)

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