🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ १७. सारग्राही का अंग)
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*साधू संगति पाइये, तब द्वन्द्वर दूर नशाइ ।*
*दादू बोहिथ बैस करि, डूँडे निकट न जाइ ॥२०॥*
जब साधक को सत्संगति प्राप्त होती है तो उसके हरिभजन के प्रभाव से काम, क्रोध आदि दोष भाग जाते हैं । अतः हरिभक्ति जैस साधन को त्यागकर दूसरे साधनों में अपने मन को नहीं लगाना चाहिये । जैसे बड़े-बड़े जहाजों से समुद्र को पार करने वाले छोटी नौकाओं की इच्छा नहीं करते । हरिभक्ति सब साधनों में श्रेष्ठ है ।
महाभारत में- निष्कण्टक मार्ग वही है जिसमें भगवान् का पूजन होता है । जिसमें गोविन्द की भक्ति नहीं हो वह तो कुत्सित मार्ग है ।
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*जब परम पदार्थ पाइये, तब कंकर दिया डार ।*
*दादू साचा सो मिले, तब कूड़ा काज निवार ॥२१॥*
जब साधक को हरिभजन से सच्चा आनन्द प्राप्त हो जाता है तो वह विषयजन्य सुख की, जो असत्य व क्षणभंगुर है, इच्छा ही नहीं होती । प्रत्युत उसको त्याग देता है । जैसे किसी को परमश्रेष्ठ रत्न प्राप्त होने पर कंकर कांच आदि की इच्छा नहीं होती । क्योंकि वे सब तो मिथ्या है ।
श्रीभागवत में- हे प्रिय ! भगवान् की भक्ति करने वाला पुरुष कभी भी दूसरे पुरुषों की तरह संसार में नहीं आता । क्योंकि भगवान् के चरणारविन्दों को पकड़ने के बाद उनको छोड़ने की इच्छा ही नहीं होती । वैसा रस उस भक्त को अन्यत्र मिलता ही नहीं ।
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*जब जीवन-मूरी पाइये, तब मरबा कौन बिसाहि ।*
*दादू अमृत छाड़ कर, कौन हलाहल खाहि ॥२२॥*
कौन बुद्धिमान् मनुष्य अमृत को छोड़कर हलाहल विष का पान करना चाहेगा । ऐसे ही भक्त को रामनामस्मरण में जो आनन्द आ रहा है उसको छोड़कर विषयसुख की कैसे इच्छा करेगा । जिसने अमृत संजीवनी बूँटी प्राप्त कर ली उसको मृत्यु प्राप्त कैसे हो सकती है । वह तो उस बूँटी को पीकर अमर हो गया ।
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*जब मानसरोवर पाइये, तब छीलर को छिटकाइ ।*
*दादू हंसा हरि मिले, तब कागा गये बिलाइ ॥२३॥*
जैसे हंस मानसरोवर को प्राप्त करके छोटे जलाशयों को त्याग देता है, वैसे ही भक्तों को हरिनाम स्मरण करने से जब भगवत्प्राप्ति हो जाती है, तब काक सदृश काम-क्रोध आदि भक्त के हृदय से स्वयं भाग जाते हैं ।
पद्मपुराण- हे राम ! सब शास्त्रों से रहित मूढ मनुष्य भी यदि आपके नाम के स्मरण से पाप के समुद्र को पार करके परम पद को प्राप्त कर लेता है तो सारे वेद, इतिहासों का सारभूत जो राम नाम है, उसके स्मरण करने से पाप निवृत्त हो जाते हैं । ब्रह्महत्या जैसा महापापों का जोर तब तक ही रहता है, जब तक भगवान् राम के नाम का उच्चारण नहीं करता ।
हे महाराज राम ! आपके नाम की गर्जना को सुनकर महापापरूपी हाथी दूसरे स्थान की इच्छा से भक्त को छोड़कर भाग जाता है । पापी डरपोक मनुष्यों को तभी तक पाप का भय है, जब तक वाणी से सुन्दर रामनाम का उच्चारण नहीं करता ।
(क्रमशः)

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