शनिवार, 12 सितंबर 2020

*६. जरणां कौ अंग ~ २१/२४*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*६. जरणां कौ अंग ~ २१/२४*
सबद अनल ज्वाला सहे, अंबुज अंबु निवास । 
ते हरि जन हरि सारिखा३, सु कहि जगजीवनदास ॥२१॥ 
{३. सारिषा - समान(तुल्य)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि शब्द कितने भी आग लगाने वाले हों वे लगाते नहीं सहेजते हैं उन से कभी आग नहीं लगती । उनको छूती भी नहीं जैसे कमल का जल में निवास । उसे कभी भी जल युक्त नहीं रखता इसी प्रकार प्रभु के भक्त भी पूर्ण रुपेण प्रभु आधारित हैं पर दिखावा नहीं है प्रभु जैसे हैं । 
अंबुज मांहै अंबु रहै, अनल मांहि न लागै लाइ४ । 
कहि जगजीवन प्रेम जल, हरि जन पीवै आइ ॥२२॥ 
(४. लाइ - अग्नि) 
संतजगजीवन जी प्रेम को निरुपित कर कह रहे है कि कमल में तो जल का भान होता है । और सब उसे अनुभव कर सुखी होते हैं किन्तु कोइ नहीं चाहता कि मै अग्नि को छूकर तप्त होऊं । संत कहते हैं कि इसी प्रकार प्रेमभाव को ही प्रभु प्रेमी चाहते हैं । 
सबद पाणि५ कहि सकै नहीं, कहै सो करै न कोइ । 
कहि जगजीवन कियां बिना, करता लखै न कोइ ॥२३॥ 
(५. पाणि - हाथ) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो शब्दों के पास क्रियान्वयन के लिये हाथ नहीं है । और जो शब्दों द्वारा कहा जाता है उसे कोइ करता नहीं । जब तक हम कुछ करेंगे नहीं तब तक ज्ञान होते हुए भी प्रभु को नहीं पा सकते । क्योंकि प्रभु तो हमारी करणी देखते हैं । 
ज्वार६ बाजरौ जौ उड़द दल, मोठ मूंग ए धांन । 
कहि जगजीवन गेंहु चणा मंहि, आठ अंन ए ग्यांन६ ॥२४॥ 
{६-६. राजस्थान प्रदेश में बहुलता से होने वाले अन्न(=धान्य) ~ १-ज्वार, २-बाजरा, ३-जौ, ४-उड़द, ५-मोठ, ६-मूंग, ७-गेंहूँ और ८-चणां} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ज्वार, बाजरा, चणा, उड़द, गैहूं, जौ, मूंग, मोठ, ये आठ प्रकार के अन्न एक ही धरती से निपज कर आठ गुण लिये हुए हैं ।
(क्रमशः)

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