शनिवार, 12 सितंबर 2020

*(“चतुर्थोल्लास” २२/२४)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“चतुर्थोल्लास” २२/२४)*
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*तब ही राव अस्थान बनाया,*
*जवाहर, हीरा, लाल जड़ाया ।* 
*बोले संत- करी चंचलाई,*
*इहै बात हमें नहीं भाई ॥२२॥* 
तब राजा ने बाग में संतों के लिये एक आश्रम बनाया उसके भवनों में हीरा, लाल आदि रत्न जडवाये । संतों ने उन्हे देखकर राजा से कहा राजन् तुमने हम से बहुत चंचलता की है, हीरे आदि भवनों में लगाना हमें पसन्द नहीं है ॥२२॥ 
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*संतों ने त्याग बताया*
*टूटी छांनि बनौं में वास,*
*रहे मगन तहां हरि के दास ।* 
*माया मोह दाझे संसारु,*
*लागे कहां इहां दरवारु ॥२३॥* 
हरि के दास भक्त टूटी फूस की कुटिया में वन में ही निवास करते हैं और राम जप करते हैं । संसार में तो माया मोह से प्राणी जलता रहता है । भजन में हरि दरबार तो बन में ही लगता है जहां संत भक्त भजन में मस्त रहते हैं ॥२३॥ 
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*दुर्बल पिंजर निर्गुण कथा,*
*धीरै धीरै लय की पंथा । 
*सर्दी गरमी देखै सो नांही,*
*अइनिसि ध्यांन धरै मन मांही ॥२४॥* 
संतों का स्थूल शरीर दुर्बल होता है और मन अन्त: करण रजतमादि गुणों से रहित होता है, शनै शनै उनके श्‍वास हरि की लय के साथ लगे रहते हैं सुरति वृति ही उनका पथ मार्ग है । वे सुख दुख आदि नहीं देखते अर्थात् सरदी गरमी, सुख दुखादि की अनुभूति से रहित होते हैं और रात दिन मन में हरि का ध्यान ही धरते रहते हैं ॥२४॥
(क्रमशः)

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