शनिवार, 19 सितंबर 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*अमृत बेली बाहिये, अमृत का फल होइ ।*
*अमृत का फल खाइ कर, मुवा न सुणिया कोइ ॥*
*दादू विष की बेली बाहिये, विष ही का फल होइ ।*
*विष ही का फल खाय कर, अमर नहिं कलि कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ बेली का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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दो भाई थे एक शुभ कर्म में रत था और दूसरा अशुभ कर्म में रत था । देनों साथ साथ मार्ग में जा रहे थे । शुभकर्मी के पैर में अकस्मात एक कांटा लगा और अशुभ कर्मी को एक मुहरों की थैली मिली ।
उसने शुभ कर्मी से कहा - "देख ! तेरे शुभकर्म का फल कांटा है । मेरे कर्म का फल यह थैली है ।"
उसने कहा - "ऐसा तो हो नही सकता ।" इस विवाद का निर्णय कराने वे एक ज्योतिषी के पास गये ।
ज्योतिषी ने कांटे वाले से कहा - आज तुझे शूली लगने वाली थी किन्तु तुम्हारे शुभकर्मों के प्रताप से शूल ही लगकर रह गया ।
थैली वाले से कहा - आज तुम्हें अच्छा राज्य मिलने वाला था परंतु तुम्हारे अशुभ कर्मों के कारण एक थैली ही मिलकर रह गयी ।
वर्तमान शुभ अशुभ से, न्यून होत प्रारब्ध ।
शूली से कांटा लगा, राज्य से थैली लब्ध ॥३९॥

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