शनिवार, 19 सितंबर 2020

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग वसँत २३(गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा वसँत ॠतु)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३७० - **परिचय सुख वर्णन** । षड् ताल
मोहन माली सहज समाना, कोई जानैं साध सुजाना ॥टेक॥
काया बाड़ी मांहीं माली, तहां रास बनाया ।
सेवग सौं स्वामी खेलन को, आप दया कर आया ॥ १ ॥
बाहर भीतर सर्व निरँतर, सब में रह्या समाई ।
परगट गुप्त गुप्त पुनि परगट, अविगत लख्या न जाई ॥२॥
ता माली की अकथ कहानी, कहत कही नहिं आवै ।
अगम अगोचर करत अनँदा, दादू ये जस भावै ॥३॥
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साक्षात्कार जन्य आनन्द का वर्णन कर रहे हैं - विश्व - बाग लगाने वाले और उसके सँरक्षक भगवान् रूप माली स्वाभाविक रूप से सब में समाये हुये हैं किन्तु इस प्रकार उनको कोई ज्ञानी सँत ही जानते हैं ।
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जैसे विश्व में वे हैं, वैसे ही काया - वाटिका में भी हैं । वे स्वामी मुझ सेवक के साथ क्रीड़ा करने के लिए स्वयँ ही दया करके मेरे हृदय में प्रकट हो आये हैं और वृत्ति रूप गोपियों के साथ रास रच कर आनन्द दे रहे हैं, तो भी वे विश्व के बाहर भीतर स्थित रहते हुये निरँतर सब में समाये हुये रहते हैं ।
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वे कभी हृदय में प्रकट रूप से भासते हैं, तो कभी गुप्त हो जाते हैं, गुप्त होकर पुन: प्रकट हो जाते हैं । वे इन्द्रियों के अविषय प्रभु बाह्य नेत्रों से नहीं दीखते ।
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उन प्रभु रूप माली की कथा, अकथनीय है वाणी द्वारा कहने पर भी यथार्थ रूप से कही नहीं जाती । वे मन से अगम और इन्द्रियों से परे रहकर भी हमारे को परमानन्द देते रहते हैं और हम उनका उक्त प्रकार यश गान करते रहते हैं ।
(क्रमशः)

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