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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थोल्लास” १९/२१)*
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*संतों का निवास बाग में*
*राजा खबरि करी रणवासू,*
*बाग मांहि संतन को वासू ।*
*दिक्षा लेवें ताहि सुहाग,*
*नहीं लेई दू यूं ताहि दुहाग ॥१९॥*
राजा ने अपने रणवास में सूचना खबर दी कि संतों ने यहां अपने बाग में ही निवास कर रखा है अत: सब रणवास वाले उनसे दीक्षा लेवें । जो दीक्षा लेगी उसी रानी का सुहाग रहेगा । जो दीक्षा नहीं लेगी उस रानी को दुहाग दे दूंगा ॥१९॥
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*इतनी बात सुनी है जब ही,*
*डोली बांधि सिधाई सब ही ।*
*वो वाकै, वो वाके आगै,*
*निव निव सब ही चरणों लागे ॥२०॥*
रणवास में राणियों ने जब यह बात सुनी तो सब राणियां डोलियों में बैठ कर बाग में संतों के पास गई । वो राणी उसके आगे और वो उसके आगे इस प्रकार में सब राणियों ने झुककर संतों के चरणों में लगकर प्रणाम किया ॥२०॥
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*राजा की सभी राणियों ने गुरु दिक्षा ली*
*दिक्षा लेहि सकल रणवास,*
*कन्या बहुत तिन्हों के पास ।*
*बार तीन सो की जै गाथू,*
*भाव सहित सुनै सब साधू ॥२१॥*
रणवास की सभी राणियों ने संतों से दीक्षा ग्रहण की उनके साथ बहुत सी कन्यायें भी थी जिन्होंने दीक्षा ली । तीन सौ बार या तीन दिन तक संतों ने ब्रह्म कथा कही और सभी ने भाव सहित एक साथ संतों के उपदेश सुने ॥२१॥
(क्रमशः)

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