शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

*नमो विश्वभरन विश्वंभर*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*सो हंसा शरणागति जाइ, सुन्दरि तहाँ पखाले पाइ ।*
*पीवै अमृत नीझर नीर, बैठे तहाँ जगत गुरु पीर ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ४०५)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*नमो विश्वभरन विश्वंभर विधाता दाता,*
*विष्णु जी वैकुण्ठ नाथ मेरे बल तेरो है ।*
*लक्ष्मी सु चरण सेव वाहन गरुड़देव,*
*आयुध सु चक्र कर तीनों लोक डेरो है ॥*
*द्वादश भगत संग दश षट पारषद,*
*भक्त वत्सल विरुद१ भीर२ परे नेरो है ।*
*राघो कहै शब्द स्पर्श, रूप रस और गंध,*
*दूर कीजे दीन बन्धु ये तो३ दोष मेरो है ॥२९॥*
विश्व का भरण-पोषण करने वाले विश्वंभर, सर्व प्रकार से संसार की रक्षा का विधान करने वाले विधाता, अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष के प्रदाता, वैकुण्ठनाथ विष्णु जी मेरे तो आपका आश्रय रूप ही बल है । 
लक्ष्मी जी भली-भांति आपके चरण-कमलों की सेवा करती रहती है, आपके दिव्य वाहन गरुड़ जी हैं, आपके हाथ में सुदर्शन चक्र रूप सुन्दर शस्त्र है, तीनों लोक ही आपका निवास स्थान हैं, 
बारह भक्त और सोलह पार्षद आपके साथ रहते हैं, आपका यश१ भक्त वत्सल रूप से प्रकट है, भक्तों में दुःख२ पड़ने पर आप पास ही प्रकट होकर सहायता करते हैं, 
हे दीन बन्धो ! मैं आपको नमस्कार करके आपसे प्रार्थना करता हूँ- मेरे में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध यह पंचविषय रूप दोष इतना३ प्रबल है कि मुझ से दूर नहीं किया जाता, आप कृपा करके इस दोष को मेरे से दूर कर दीजिये । भाव यह है- मुझे मुक्ति प्रदान करने की कृपा कीजिये ।
(क्रमशः)

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