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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*६. जरणां कौ अंग ~ १७/२०*
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जहँ मन लागै सुरति स्यूँ, तहँ ही भगति जमाव ।
जगजीवन सब अंग का, सम्रथ करै सामाव ॥१७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ ध्यान द्वारा मन लगता है वहाँ ही भक्ति का भाव जमता है । सब अंगों की क्रिया विधि का समायोजन परमात्मा करते हैं ।
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खाया पीया देहि जरी, तो खिरै न कबहूं खोड़ि१२ ।
कहि जगजीवन खोज तन, खालिक१३ सूं दिल जोड़ि ॥१८॥
{१२. खोड़ि - खोखला स्थान(कोटर)} {१३. खालिक - सृष्टिकर्ता(=सिरजनहार)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि खाना पीना सब देह में समाता है उसमें कहीं कोटर नहीं होती, तो फिर इतने पूरणहार प्रभु को ही हमें उसमें ढूंढना चाहिए और अपना मन उनसे ही लगाना चाहिए ।
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मारि मारि मांही रहै, गिरतनियां१४ तजि आस ।
अंबु सुति१५ बिगसै अमी झरै, सु कहि जगजीवनदास ॥१९॥
{१४. गिरतनियां - गिरितनया(=पार्वती, माया)} {१५. अंबु सुति - हृदयकमल}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पार्वतीजी ने सब और से मन मार कर अंतर शिव ध्यान में लगा लिया था, पर सबने उनके सफल होने की आशा त्याग दी थी । किंतु उनकी लगन से प्रभु का हृदय कमल विकसित हुआ और कृपा रुपी अमृत से उनका मनोरथ पूर्ण हुआ ।
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कहि जगजीवन तेजरौ, १ एकअंतरौ२ जाइ ।
त्रिविध ताप तन की मिटै, गोबिंद का गुण गाइ ॥२०॥
(१. तेजरौ - तीन दिन के अन्तर से आने वाला ज्वर) (२. एकअंतरौ - एक दिन के बाद आने वाला ज्वर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हमारे त्रिविध ताप दैहिक दैविक भौतिक एक औषध या अतंर से मिट जाते हैं, वह अतंरा है गोविंद के गुणगान । जो सभी तापों को शान्त करता है ।
(क्रमशः)

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