शनिवार, 19 सितंबर 2020

विश्‍वास का अंग १९ - ५/९

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विश्‍वास का अंग १९ - ५/९)
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*दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।*
*दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥५॥*
मेरा स्वामी तो केवल वह ही है, जो यथा समय पर सबका पालन पोषण कर सबको जीवन देता और मारता है । अतः सब कार्य उसकी इच्छा से ही होते हैं । 
महाभारत में- “समुद्र में डूबने पर, पर्वत से नीचे गिरने पर, तक्षक सर्प से डसने पर भी जीव मरता नहीं, क्योंकि उसकी आयु(प्रारब्ध) रक्षा कर रही है । इसलिये सैंकड़ों बाणों से घायल होने पर भी बिना समय के मनुष्य मरता नहीं । मृत्यु का समय आने पर कुशा के अग्रभाग(दूब के तिनके) के स्पर्श मात्र से मर जाता है ।”
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*दादू स्वर्ग भुवन पाताल मधि, आदि अंत सब सृष्ट ।*
*सिरज सबन को देत है, सोई हमारा इष्ट ॥६॥*
जो स्वर्ग, पाताल आदि चौदह भुवनों में सृष्टि बनाकर मरणपर्यन्त सब प्राणियों को अन्न जल के द्वारा जीवित रखता है । वह प्रभु ही मेरा इष्टदेव हैं ।
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*करणहार कर्त्ता पुरुष, हमको कैसी चिंत ।*
*सब काहू की करत है, सो दादू का दादू मिंत ॥७॥*
सृष्टि को बनाने वाले परम पुरुषोत्तम भगवान् जब सबका पालन कर रहे हैं, तो क्या वह मेरा पालन नहीं करेंगे ? अवश्य करेंगे, क्योंकि मेरे तो वे प्यारे मित्र हैं । अतः वैष्णवों को वस्त्र भजन की चिन्ता को त्यागकर उनका भजन ही करना चाहिये । लिखा है कि भक्त होकर वस्त्र भोजन की चिन्ता व्यर्थ ही करते हैं, क्योंकि जो विश्व को भर रहा है, वह क्या भक्तों को नहीं देखता ?
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*दादू मनसा वाचा कर्मणा, साहिब का विश्‍वास ।*
*सेवक सिरजनहार का, करे कौन की आस ?८॥*
जो दृढ़विश्वास से कर्म, मन, वाणी से प्रभु को भजता है और उसी का विश्वास करता है, भगवान् उसकी सब आशाओं को पूर्ण कर देते हैं । अतः भक्त को किसी दूसरे की आशा नहीं करनी चाहिये । गीता में- “जो अनन्य मन से भगवान् को भजते हैं तथा नित्य ही उनकी सेवा में लगे रहते हैं, उन सब भक्तों का योगक्षेम मैं चलाता हूँ ।”
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*श्रम न आवै जीव को, अनकिया सब होइ ।*
*दादू मारग मिहर का, बिरला बूझै कोइ ॥९॥*
यद्यपि सभी का योगक्षेम भगवान् ही चलाते हैं तथापि अन्य लोगों को उद्योग द्वारा देते हैं, परन्तु भक्त तो कोई प्रयास भी नहीं करते फिर भी स्वयं भगवान् उनका योगक्षेम चलाते हैं । यही भक्तों की विशेषता है परन्तु इस भगवान् की दया को बिरले ही जानते हैं ।
(क्रमशः)

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