शनिवार, 19 सितंबर 2020

*ज्ञानी और भक्त में अन्तर*

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*साधु जन क्रीड़ा करैं, सदा सुखी तिहिं गाँव ।*
*चलु दादू उस ठौर की, मैं बलिहारी जाँव ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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(४)
*सच्चिदानन्द-लाभ का उपाय । ज्ञानी और भक्त में अन्तर* 

समाधि टूटी । इसी बीच में नरेन्द्र उन्हें समाधिस्थ देखकर कमरे से बाहर पूर्ववाले बरामदे में चले गए हैं । वहाँ हाजरा महाशय एक कम्बल के आसन पर हरिनाम की माला हाथ में लिए बैठे हैं । नरेन्द्र उनसे बातें कर रहे हैं । इधर कमरा दर्शकों से भरा है । समाधि-भंग के बाद श्रीरामकृष्ण ने भक्तों की ओर दृष्टि डाली तो देखा कि नरेन्द्र वहाँ नहीं हैं । तम्बूरा सूना पड़ा है । सब भक्त उनकी ओर उत्सुक होकर देख रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण- आग लगा गया है, अब चाहे वह रहे या न रहे !
(कप्तान आदि से) “चिदानन्द का आरोप करो तो तुम्हें भी आनन्द मिलेगा । चिदानन्द तो है ही, - केवल आवरण और विक्षेप है ।* विषय पर आसक्ति जितनी घटेगी, उतनी ही ईश्वर पर रुचि बढ़ेगी ।
(*अर्थात् वह ढक गया है और उसकी जगह दूसरी चीज का आभास हो रहा है)
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कप्तान- कलकत्ते के घर की ओर जितना ही बढ़ोगे, वाराणसी से उतनी ही दूर होते जाओगे ।
श्रीरामकृष्ण- श्रीमती(राधिका) कृष्ण की ओर जितना बढ़ती थीं उतनी ही कृष्ण की देहगन्ध उन्हें मिलती जाती थी । मनुष्य जितना ही ईश्वर के पास जाता है उतनी ही उसकी उन पर भाव-भक्ति होती जाती है । नदी जितनी ही समुद्र के समीप होती है उतना ही उसमें ज्वार-भाटा होता है ।
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“ज्ञानी के भीतर मानो गंगा एक-सी बहती रहती है । उसके लिए सभी स्वप्नवत् है । वह सदा स्व-स्वरूप में स्थित रहता है । पर भक्त की गंगा एक गति से नहीं बहती । भक्त कभी हँसता, कभी रोता है; कभी नाचता और कभी गाता है । भक्त ईश्वर के साथ विलास करना चाहता है – वह कभी तैरता है, कभी डूबता है और कभी फिर ऊपर आता है – जैसे बर्फ का टुकड़ा पानी में कभी ऊपर और कभी नीचे आता-जाता रहता है ! (हँसी)
(क्रमशः)

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