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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ ५/८*
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चतुरानन१ मुख च्यारि सूं, चार वेद नित भाखि ।
जगजीवन असतुति करै, रांम नांम निज साखि ॥५॥
{१. चतुरानन - चतुर्मुख(=ब्रह्मा)}
महिमा का वर्णन ब्रह्मा अपने चार मुख से चार वेदो में कहते हैं उन राम की स्तुति संतजगजीवन जी अपनी साखियों में कर रहे हैं ।
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जस है तस ते अनजाने, जांने मति उनमान ।
कहि जगजीवन सबद कहै, सोई सक्ति सुर ग्यांन ॥६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं जैसै वे प्रभु हैं वैसा कोइ नहीं जानता सब अनुमान कहते हैं । जो शब्द उनकी महिमा में कहे जाते हैं वे ही स्वर ज्ञान हैं ।
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जगजीवन भगवंत की, कछु गति लखी न जाइ ।
गन गन्ध्रव मुनि अवलिया२, थकित भये लिव लाइ३ ॥७॥
{२. अवलिया - औलिया(सिद्ध महात्मा)} (३. लिव लाइ - लय योग में रत रह कर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भगवान की गति स्थिति कोइ नहीं जान सकता गण, गन्धर्व, पीर, सिद्ध, योगी, महात्मा सब उन्हीं में लगन लगा कर उन्हें पाने के लिये प्रयत्न करते करते थक गये हैं ।
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जगजीवन बोलै नहीं, अरु जहँ बोलै बोल ।
तहँ कछु है सो अगम है, ताका मोल न तोल४ ॥८॥
(४. मोल न तोल - अमूल्य एवं अपरिमाण)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कुछ न बोले और बोले तो ऐसे बोल बोले कि वे उन प्रभु तक पहुंचें जहां कोइ नहीं पहुंच सकता वह अमूल्य है ।
(क्रमशः)

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