शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

= *निन्दा का अंग १२३(१३/१६)* =

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*अनदेख्या अनरथ कहैं, अपराधी संसार ।*
*जद तद लेखा लेइगा, समर्थ सिरजनहार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*निन्दा का अंग १२३*
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निंदक दु:ख दोषों भर्या, कहै अजुगती१ बात ।
रज्जब रोग अपार२ मन, धेरि रही घट३ घात४ ॥१३॥
निंदक दु:ख और दोषों से भरा हुआ है, अयुक्त१ बात कहता है, उसके मन में निंदा रूप असाध्य२ रोग है और उसके अंत:करण३ को बुराई४ घेरे रहती है ।
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सारंग१ सरोवर स्वप्न सुख, तीजे निंदक बैन२ ।
जन रज्जब मिथ्या सु मुर३, कहु किन पाया चैन४ ॥१४॥
मृग१ तृष्णा का सरोवर, स्वप्न का सुख और तीसरा निंदक वचन२ ये तीनों३ मिथ्या ही हैं, कहो इनसे किसने सुख४ प्राप्त किया है ।
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निंदक नरक१ समान है, वाणी विविध कुवास२ ।
रज्जब सुन सूंघे नहीं, कुमिंत३ कान की नास ॥१५॥
निंदक मल१ के समान है और नाना प्रकार की वाणी ही उसकी दुर्गंध२ है, कुमित्र३ रूप कान की नाशिका से सुनकर उसे कभी नहीं सूंघना चाहिये अर्थात कुमित्र से सुनकर उसे धारण नहीं करना चाहिये मिथ्या समझ त्याग देना चाहिये ।
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रज्जब दिल दोष हुं भर्या, आतम१ अवगुण पूरि ।
सेझा२ अंग३ अज्ञान का, करैं कौन विधि दूरि ॥१६॥
निंदक का हृदय दोषों से भरा रहता है, उसके अंत:करण१ में अवगुण परिपूर्ण रूप से भरे रहते हैं, उसका शरीर३ अज्ञान का उदगम२ स्थान है, उक्त तीनों को उससे किस प्रकार दूर करे ?
(क्रमशः)

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