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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग वसँत २३(गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा वसँत ॠतु)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३६७ - **मन स्थिरार्थ बिनती** । एक ताल
मेरे मोहन मूरति राखि मोहि,
निश वासर गुण रमेँ तोहि ॥टेक॥
मन मीन होइ ज्यों स्वाद खाइ,
लालच लागो जल तैं जाइ ।
मन हस्ती मातो अपार,
काम अँध गज लहै न सार ॥१॥
मन पतँग पावक परै,
अग्नि न देखे ज्यों जरे ।
मन मृगा ज्यों सुनैं नाद,
प्राण तजै यूँ जाइ बाद ॥२॥
मन मधुकर जैसे लुब्ध वास,
कवल बंधावै होइ नास ।
मनसा वाचा शरण तोर,
दादू को राखो गोविन्द मोर ॥३॥
मन की चपलताजन्य क्लेश से रक्षार्थ विनय कर रहे हैं - हे मेरे मोहन ! मुझे अपने स्वरूप में संलग्न रखिये । मैं रात्रि - दिन आपके गुणों में रमण करता रहूं, ऐसी कृपा करिये ।
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जैसे मच्छी स्वाद - वश लोभ में लगकर माँस युक्त कंटक खाती है, तब जल से बाहर जाती है, वैसे ही यह मन आपके स्वरूप को छोड़ कर विषयों में जाता है । जैसे कामाँध गज अत्यधिक मस्ती में आकर कागज की हथिनी पर पड़ता है, वैसे ही यह मन आपके स्वरूप - ज्ञान रूप सार को न ग्रहण करके काम - वश हो बन्धन में पड़ता है ।
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जैसे पतँग दीप - ज्योति रूप अग्नि में पड़कर जलता है, वैसे ही यह मन सुन्दर रूप को अग्नि न समझ कर उसमें पड़ता है और चिन्ता से जलता है । जैसे मृग नाद सुनने के लिए प्राण छोड़ देता है, वैसे ही यह मन अनुचित शब्दों पर जाकर व्यर्थ दु:ख पाता है ।
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जैसे भ्रमर गँध के लोभ से सायँकाल में सूर्यमुखी कमल पर जाकर बैठता है और कमल - कोश बन्द होने पर उसी में बन्द होकर नाश हो जाता है, वैसे ही मन गँधाधीन होकर व्यथित होता है । हे मेरे गोविन्द ! मैं मन वचन से आपकी शरण हूं, मेरे मन को अपने स्वरूप में स्थिर करके उसकी चलपता जन्य दु:ख से मेरी रक्षा करिये।
(क्रमशः)

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