गुरुवार, 3 सितंबर 2020

*च्यारयों जुग के संत*

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*ये निज सेवक तेरड़े, सब आज्ञाकारी ।*
*मोको ऐसे कीजिये, दादू बलिहारी ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २३९)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*गुरु गोविन्द प्रणाम कर, तब गम१ तो कों होय है ।*
*च्यारयों जुग के संत, मगन माला ज्यों पोय है ॥*
*नग रूपी निज संत, पोई प्रकट कर वाणी ।*
*गगन२ मगन गलतान३, हेरि४ हिरदा मधि आंणी ॥*
*मंगल रूपी मांड में, हरि हरिजन तारन तिरन ।*
*भृत्य५ करत विरुदावली६, जन राघव भणि७ भव दुख हरन ॥२१॥*
भक्तमाल लिखने की आज्ञा देने वाले प्रह्लाददास जी कहते हैं वा राघवदासजी ही अपने मन को कहते हैं- प्रथम तू गुरु और गोविन्द को प्रणाम कर, तब ही भक्तमाल लिखने में तेरी अच्छी प्रगति१ होगी और जैसे माला में मणिये पाये जाते हैं वैसे ही चारों युगों के ...
संत जो भगवान् के निजी भक्त हैं, वे ही नग रूप हैं । उनको भक्तमाल में पोकर अपनी वाणी को प्रकट कर । जो पूराणे भक्त ब्रह्म२ में निमग्न हुये हैं, उनका अन्वेषण४ कर, फिर उनका यश हृदय में लाकर संग्रहकर । 
हरि और स्वयं संसार-सागर से तिरे हुये तथा शरणागतों का तारने वाला हरि भक्त इस ब्रह्माण्ड में मंगल रूप हैं । उनके यश की-पक्तियों६ का गान सेवक५ जन करते ही रहते हैं । हे राघवदास ! वा, हे मुझ राघवदास के मन ! तू संसार के जन्मादि दुःख को नष्ट करने वाले भक्त जनों का यश प्रेम सहित कथन७ कर ।
(क्रमशः)

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