बुधवार, 2 सितंबर 2020

= *वक्त ब्यौरा का अंग १२२(५७/६०)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*दादू कोटि अचारिन एक विचारी, तऊ न सरभर होइ ।*
*आचारी सब जग भर्या, विचारी विरला कोइ ॥*
=================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
.
तल कहार कसकत१ चलै, श्वान सुखासन२ थान ।
रज्जब किया रोस३ क्या, भावी४ भिन्न सुजान ॥५७॥
नीचे तो कहार बोझ के कारण होने वाले दु:ख से दुखित१ हुये चलते हैं और उपर पालकी२ में बैठा हुआ कुत्ता अपने स्थान को जा रहा है । तो क्या कहारों पर ईश्वर ने क्रोध३ किया है ? हे सुजान ! ईश्वर ने क्रोध नहीं किया है कुत्ते का और कहारों का होनहार४ भिन्न भिन्न है ।
.
रज्जब कंधी पावड़यों, काष्ठहु लागा एक ।
भाग१ भिन्न ठाहर मिलहिं, ब्योरा२ किया विवेक ॥५८॥
कंघी और खड़ाओं में एक ही काष्ठ लगा होता है किन्तु कंघी शिर पर जाती है और खड़ाओं को चरण-तल-स्थान होता है । वैसे ही एक ही माता पिता से दो पुत्र होते हैं किन्तु उनका भाग्य१ भिन्न भिन्न होने से स्थान भी उंच-नीच भिन्न ही मिलता है, विवेक के द्वारा भाग्य और वक्त का यही विवरण२ किया गया है ।
.
रज्जब महन्त मयंक१ कन२, सभा सु मंडल होय ।
आतम उडग३ अनेक हैं, तहाँ न घाघ्रट४ होय ॥५९॥
चन्द्रमा१ के पास२ तारा३ मंडल रहता है, उसमें अनेक तारे हैं किन्तु वहाँ किसी दिशा में भी लड़ाई४ नहीं होती । वैसे ही महान संत के पास सभा रहती है, उसमें अनेक जीवात्मायें रहती हैं किन्तु किसी ओर भी कोई शब्द नहीं होता सब शांत भाव से संत का उपदेश सुनते हैं, यह भी वक्त की ही बात है, यह समय वैसा ही होता है ।
.
रज्जब भावी१ भाल२ में, सभा सु तिन के पास ।
रवि शशि बिन मंडल नहीं, अवलोकहु३ आकाश ॥६०॥
जैसे सूर्य चन्द्र बिना मण्डल(सूर्य-चन्द्र के चारों ओर का प्रकाशमय गोला) नहीं है, यह आकाश में देख३ सकते हो, और महान संत के पास सभा रहती है । वैसे ही मस्तक२ में होनहार१ अंकित है, अर्थात होनहार साथ ही रहता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें