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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३५७/६०*
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सब देवौं सिर देव हैं, सब पीरौं सिर पीर ।
सब जानौं७ सिर जांन है, जगजीवन हरि धीर ॥३५७॥
(७. जांन-प्राण या प्राणी)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो सब देवों के देव हैं सब पीरों के पीर हैं । सब जीवों के जीव हैं वे प्रभु धैर्य धारण किये सबका निर्वहन कर रहे हैं ।
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सब नूरौं सिर नूर है, सब तेजौं सिर तेज ।
सब जोतौं सिर जोति है, जगजीवन पिव सेज ॥३५८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु सभी सौन्दर्यों के सौन्दर्य हैं । सभी तेजों के तेज हैं, सभी ज्योतियों की ज्योति हैं, ये सब परमात्मा का सानिध्य है ।
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तुम्हरे कोटि अनेक त्रिय८,मेरे तुम हरि९ एक ।
कहि जगजीवन रांमजी, मैं भ्रम तज्या अनेक ॥३५९॥
{८. त्रिय - स्त्रियाँ(=पत्नियाँ)} (९. हरि - पति, स्वामी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आपकी अनेक आत्मायें है जो आपकी स्त्रियां है किंतु मेरे स्वामी प्रभु आप ही हैं । संत कहते हैं कि हे राम जी अब मैंने सभी भ्रम मिटा लिये हैं ।
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बात अटपटी१ रांमजी, नैक२ न मांहि सुहाइ ।
कहि जगजीवन सोइ कहौ, जिहिं तुम परसौं३ आइ ॥३६०॥
{१. अटपटी - कठिन, ऊटपटांग,(तर्क-वितर्क वाली)} (२. नैक - कुछ भी)
(३. परसौं - साक्षात्कार कर सकूं)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है प्रभु मुझे तर्क वितर्क जरा भी अच्छा नहीं लगता । मुझे तो वह ही बात अच्छी लगती है जिससे आप मिल जाओ ।
(क्रमशः)

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