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*साहिब सौं सन्मुख रहै, सत संगति में आइ ।*
*दादू साधू सब कहैं, सो निष्फल क्यों जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *कुसंग*
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एक पापी मनुष्य ने एक संत से पूछा कि - "मैंने बहुत पाप किये हैं, यदि मैं पाप न करूं तो ईश्वर मुझ पर क्षमा करेंगे या नहीं ?" संत - "जिस गांव में तू रहता है तो उसमें सब लोग तामसी हैं, यदि तू उनका संग छोड़कर अमुक गांव में सात्विक पुरुषों की संगति में रहे तो तेरा कल्याण होगा ।"
वह पुरुष पाप कर्मों को त्यागकर अपने नगर को चला दिया, किन्तु मार्ग में ही उसका शरीर छूट गया । तब यमदूतों और पार्षद उसे लेने के लिये आये और अपनी - अपनी और खींचने लगे । उसी समय आकाशवाणी हुई कि - "यह कुसंग छोड़कर सत संग के लिये भक्तों के गांव की सीमा में आ गया है, इसलिये इसे यमदूत छोड़ देवें ।"
कुसंग तज सत संग की, इच्छा से कल्याण ।
पार्षद अरु यम दूत झट, आये छूटत प्राण ॥२७३॥

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