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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग सूहा २२(गायन समय दिन ९ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**काया बेली ग्रन्थ**
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३६१ - वर्ण भिन्न ताल ।
काया मांहीं अनुभै सार,
काया मांहीं करै विचार ।
काया मांहीं उपजै ज्ञान,
काया मांहीं लागै ध्यान ॥१॥
काया मांहीं अमर स्थान,
काया मांहीं आत्मराम ।
काया मांहीं कला अनेक,
काया मांहीं कर्ता एक ॥२॥
काया मांहीं लागै रँग,
काया मांहीं साई संग ।
काया मांहीं सरवर तीर,
काया मांहीं कोकिल कीर१ ॥३॥
काया मांहीं कच्छप नैन,
काया मांहीं कुंजी२ बैन ।
काया मांहीं कवल प्रकास,
काया मांहीं मधुकर वास ॥४॥
काया मांहीं नाद कुरंग३,
काया मांहीं ज्योति पतंग ।
काया मांहीं चातक मोर,
काया मांहीं चँद चकोर ॥५॥
काया मांहीं प्रीति कर,
काया मांहीं सनेह ।
काया मांहीं प्रेम रस,
दादू गुरुमुख येह ॥६॥
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**= काया मांहीं अनुभवसार =**
काया में ही विश्व के सार परब्रह्म का अनुभव होता है ।
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**= काया मांहीं करै विचार =**
काया में ही बुद्धि द्वारा ब्रह्म विचार करते रहना चाहिए ।
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**= काया मांहीं उपजै ज्ञान =**
काया में ही आत्मज्ञान की उत्पत्ति होती है ।
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**= काया मांहीं लागै ध्यान =**
काया में ही ब्रह्म का ध्यान लगता है ।
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**= काया मांहीं अमर स्थान =**
काया में निर्विकल्प समाधि ही अमर स्थान है । निर्विकल्प समाधि में स्थित को काल नहीं मार सकता ।
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**= काया मांहीं आत्मराम =**
व्यापक होने से काया में आत्मस्वरूप राम है ।
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**= काया मांहीं कला अनेक =**
जैसे लोक में गीत, वाद्य,नृत्य आदि काम शास्त्र की ६४ कला तथा अन्य अनेक कलाएं हैं, वैसे ही शरीर में भी इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि आदि अनेक कला हैं ।
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**= काया मांहीं कर्ता एक =**
जैसे ब्रह्माँड में प्रेरक कर्त्ता एक ईश्वर ही हैँ, वैसे ही काया में भी वह एक ही प्रेरक कर्त्ता है ।
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**= काया मांहीं लागै रंग =**
परमेश्वर की भक्ति रूप रँग काया में ही लगता है ।
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**= काया मांहीं साई संग =**
ईश्वर व्यापक होने से काया में जीव के साथ ही है ।
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**= काया मांहीं सरवर तीर, काया मांहीं कोकिल कीर१ =**
काया में हृदय सरोवर है और उसके तीर पर काया में ही बुद्धि रूप कोकिल, मन रूप शुक१ पक्षी है ।
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**= काया मांहीं कच्छप नैन =**
जैसे कूर्म की दृष्टि एकाग्र अँडों पर रहती है, वैसे ही परब्रह्म में लगी विचार रूप दृष्टि कच्छप - नेत्र काया में हैं ।
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**= काया मांहीं कुंजी२ बैन =**
जैसे क्रौंच२ पक्षी की आवाज एक अँडाकार वृत्ति रखते हुये होती है, वैसे ही काया में एक ब्रह्माकार वृत्ति रखते हुये ध्यानावस्था में वचन व्यवहार होता है ।
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**= काया मांहीं कमल प्रकाश =**
साधन - सूर्य की किरचरणों से काया में हृदय - कमल खिलता है ।
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**= काया मांहीं मधुकर वास =**
उक्त कमल की ब्रह्म रूप सुगँध का अनुभव मन - भ्रमर काया में रहता है ।
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**= काया मांहीं नाद कुरँग३ =**
जैसे लोक में नाद पर मृग३ मोहित होता है, वैसे ही काया में शब्द से श्रवण इन्द्रिय रूप मृग मोहित होता है ।
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**= काया मांहीं ज्योति पतँग =**
जैसे लोक में ज्योति पर पतँग मोहित होता है, वैसे ही काया में नेत्र रूप पतँग रूप - ज्योति पर मोहित होता है ।
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**= काया मांहीं चातक मोर =**
जैसे स्वाति बिन्दु के लिए चातक पुकारता है, वैसे ही काया में इच्छित वस्तु के लिए मन रूप चातक पुकारता है । जैसे बादल से जल वृष्टि के लिए मोर पुकारते हैं वैसे ही काया में प्राण रूप मोर जल के लिए पुकारते हैं ।
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**= काया मांहीं चन्द चकोर =**
जैसे चन्द्रमा पर चकोर दृष्टि स्थिर रखता है, वैसे ही काया में सँत चित्त रूप चकोर, ब्रह्म रूप चन्द्रमा पर चिन्तन रूप दृष्टि सदा रखता है ।
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**= काया मांहीं प्रीति कर =**
काया में ही इन्द्रियों द्वारा प्रभु से प्रीति करो ।
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**= काया मांहीं सनेह =**
शरीर में ही मन द्वारा प्रभु से स्नेह करो ।
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**= काया मांहीं प्रेम रस =**
शरीर में ही प्रभु - प्रेम रस प्राप्त होता है ।
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**= दादू गुरुमुख येह =**
ये उक्त सभी बातें गुरुमुख द्वारा जान कर साधन करने से काया में प्रत्यक्ष भासती है ।
(क्रमशः)

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