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*दादू एक हमारे उर बसै, दूजा मेल्या दूर ।*
*दूजा देखत जाइगा, एक रह्या भरपूर ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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“उत्तम भक्त कौन है ? जो ब्रह्मज्ञान के बाद देखता है कि ईश्वर ही जीव, जगत और चौबीस तत्त्व हुए हैं । पहले ‘नेति नेति’(यह नहीं, यह नहीं) करके विचार करते हुए छत पर पहुँचना पड़ता है । फिर वही आदमी देखता है कि छत जिन चीजों – ईंट, चूने और सुरखी – से बनी है, सीढ़ी भी उन्हीं से बनी है । तब देखता है कि ब्रह्म ही जीव, जगत और सब कुछ है ।
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“केवल शुष्क विचार ! मैं उस पर थूकता हूँ । (आप जमीन पर थूकते हैं ।)
“क्यों विचार कर शुष्क बना रहूँगा ! जब तक ‘मैं’ और ‘तुम’ है, तब तक प्रार्थना है कि ईश्वर के चरणकमलों में शुद्ध भक्ति बनी रहे ।
(गोविन्द से)- “कभी कहता हूँ, तुम्हीं ‘मैं’ हो और ‘मैं’ ही ‘तुम’ हूँ । फिर कभी ‘तुम्हीं तुम हो’ – ऐसा हो जाता है ! इस समय अपने अहं को ढूँढ़ नहीं पाता ।
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“शक्ति का ही अवतार होता है । एक मत से राम और कृष्ण चिदानन्द समुद्र की दो लहरें हैं ।
“अद्वैतज्ञान के बाद चैतन्य होता है । तब मनुष्य देखता है कि ईश्वर ही सब प्राणियों में चैतन्य रूप से विद्यमान हैं । चैतन्यलाभ के बाद आनन्द होता है – ‘अद्वैत-चैतन्य-नित्यानन्द’ ।*(*पन्द्रहवीं शताब्दी में नदिया में तीन महापुरुष भी इन्हीं नामों के हुए थे । उनमें श्रीचैतन्य भगवान् के अवतार समझे जाते हैं । शेष दो उनके पार्षद थे ।)
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(मास्टर से)- “और तुमसे कहता हूँ – ईश्वर के रूप पर अविश्वास मत करना । यह विश्वास करना कि ईश्वर के रूप हैं, फिर जो रूप तुम्हें पसन्द हो उसी का ध्यान करना ।
(गोविन्द से)- “बात यह है कि जब तक भोग-वासना बनी रहती है, तब तक ईश्वर को जानने या उनके दर्शन करने के लिए प्राण व्याकुल नहीं होते । बच्चा खेल में मग्न रहता है । मिठाई देकर बहलाओ तो थोड़ीसी खा लेगा । जब उसे न खेल अच्छा लगता है न मिठाई, तब वह कहता है, ‘माँ के पास जाऊँगा ।’ फिर वह मिठाई नहीं चाहता । अगर कोई आदमी, जिसे उसने न कभी देखा है और न पहचानता है, आकर कहे, ‘आ, तुझे माँ के पास ले चलूँ’, तो वह उसके साथ चला जाएगा । जो कोई उसे गोद में बिठाकर ले जायगा, वह उसी के साथ जाएगा ।
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“संसार के भोग समाप्त हो जाने के बाद ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होते हैं । उस समय केवल एक चिन्ता रहती है कि किस तरह उन्हें पाऊँ । उस समय जो जैसा बताता है, मनुष्य वैसा ही करने लगता है ।”
मास्टर(स्वगत)- भोगवासना समाप्त हो चुकने के बाद ही ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होते हैं ।
(क्रमशः)

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