🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग १९ - १८/२२)
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*तन मन सौंज सँवार सब, राखै बिसवा बीस ।*
*सो साहिब सुमिरै नहीं, दादू भान हदीस ॥१८॥*
जिस प्रभु ने इस शरीर को नेत्र, मुख, हाथ, पैर आदि का दान देकर बड़ा ही रम्य बना दिया तथ सदा इसकी रक्षा करता रहता है । हे जीव ! तुमने भी गर्भवास काल में प्रतिज्ञा की थी कि हे प्रभो ! गर्भ से बाहर जाने पर आपको कभी नहीं भूलूंगा सो उस प्रतिज्ञा को याद करके उसका स्मरण करो ।
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*दादू सो साहब जनि विसरै, जिन घट दिया जीव ।*
*गर्भवास में राखिया, पालै पोषै पीव ॥१९॥*
जिस परमात्मा ने यह सुन्दर शरीर दिया और जीव बनकर प्राणों को धारण कर रहा है, गर्भवास में इसकी जठराग्नि से रक्षा की थी और सब भी अन्नजल देकर रक्षा कर रहा है । क्या ऐसा परमात्मा भुलाने योग्य है ? नहीं ? हे जीव ! ऐसे गुणों से युक्त ईश्वर को बार-बार भज ।
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*दादू राजिक रिजक लिये खड़ा, देवे हाथों हाथ ।*
*पूरक पूरा पास है, सदा हमारे साथ ॥२०॥*
हे साधक ! वह प्रभु तेरे लिये अन्न जल आदि जो जीवन के साधन हैं, उनको लेकर तेरे सन्मुख ही खड़ा है और अपने हाथों से भक्तों को देख रहा है वह सर्वव्यापक है, अतः तेरे पास में ही रहता है । फिर भी तूं उसको क्यों नहीं भजता है ? ऐसे परमात्मा को मत भूल । लिखा है- “तुझे अपने प्रभु को सर्वात्मभाव से भजना चाहिये । उसको भजने वाले कैसे भी क्यों न हो, फिर भी वे महान् होते हैं और सबको पवित्र बना देते हैं ।”
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*हिरदै राम सँभाल ले, मन राखै विश्वास ।*
*दादू समर्थ सांइयां, सब की पूरै आस ॥२१॥*
हे साधक जीव ! तूं उस परमात्मा को विश्वास के साथ अपने मन में ही भज, क्योंकि वह सर्वसमर्थ और सकल प्राणियों की कामना को पूर्ण करने वाला है ।
प्रबोधसुधाकर में कहा है- “हे चित्त ! इस संसार को शोकसंतप्त और हाहाकार से व्याकुल देखकर भगवान् विष्णु के उस शोकहीन परम पद को भज ।
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*दादू सांई सबन को, सेवक ह्वै सुख देइ ।*
*अया मूढ मति जीव की, तो भी नाम न लेइ ॥२२॥*
यह परमात्मा प्राणियों की सेवक की तरह से सेवा कर रहा है और सब को सुख दे रहा है । फिर भी मूढ मनुष्य उसका नाम भी याद नहीं करता । यह प्राणियों की मूर्खता ही है । कम से कम उसका नाम तो याद करना ही चहिये ।
किसी कवि ने लिखा है कि “हम जंगल में रहने वाले हैं और नदी को पार करते हैं । वसुधां हरामः – हल से पृथ्वी को जोतते हैं । गोभिश्चरामः – गायों के साथ चलते हैं । सुपथं सरामः – सुन्दर मार्ग से जाते हैं । इस प्रकार बार-बार नाम लेते हुए मुक्तिपद को पहुँच जाते हैं । अतः सभी को किसी प्रकार से राम का नाम जपना चाहिये ।”
(क्रमशः)

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