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*दादू कहै, तन मन तुम पर वारणैं, कर दीजे कै बार ।*
*जे ऐसी विधि पाइये, तो लीजे सिरजनहार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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सन्ध्या हुई । नौकर बत्तियाँ जला गया । दासी ने श्रीरामकृष्ण के कमरे में दीप जलाकर धूनी दी । बढ़ शिवमन्दिरों में आरती होते ही विष्णु तथा काली के मन्दिर में आरती होने लगी । घण्टा, घड़ियाल आदि का मधुर गम्भीर नाद उठने लगा – मन्दिर के निकट ही बहती हुई गंगा का कलकलनिनाद तो गूँज ही रहा था ।
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श्रावण की कृष्णा प्रतिपदा है । थोड़ी ही देर में चाँद निकला । प्रांगण तथा उद्यान के वृक्ष धीरे धीरे चन्द्रकिरण से आप्लावित हो गए । ज्योत्स्ना के स्पर्श से भागीरथी का जल मानो प्रफुल्लित होकर बह रहा है ।
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सन्ध्या होते ही श्रीरामकृष्ण जगन्माता को प्रणाम करके तालियाँ बजाते हुए हरिध्वनि करने लगे । कमरे में बहुत से देवदेवियों की तस्वीरें थी – जैसे ध्रुव और प्रहलाद की, राजाराम की, कालीमाता की, राधाकृष्ण की – आपने सभी देवताओं को उनके नाम ले लेकर प्रणाम किया । फिर कहने लगे, ‘ब्रह्म-आत्मा, भगवान् भागवत-भक्त-भगवान्, ब्रह्म-शक्ति, शक्ति-ब्रह्म; वेद-पुराण-तन्त्र; गीता-गायत्री; मैं शरणागत हूँ, शरणागत हूँ; नाहं नाहं(मैं नहीं, मैं नहीं), तू ही; तू ही; मैं यन्त्र हूँ, तुम यंत्री हो; इत्यादि ।
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नामोच्चारण के बाद श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़कर जगन्माता का चिन्तन करने लगे । सन्ध्या समय दो-चार भक्त बगीचे में गंगा के किनारे टहल रहे थे । आरती के बाद वे एक-एक एक करके श्रीरामकृष्ण के कमरे में इकट्ठे होने लगे । श्रीरामकृष्ण तख्त पर बैठे हैं । मास्टर, अधर, किशोरी आदि नीचे, उनके सामने बैठे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण(भक्तों से)- नरेन्द्र, भवनाथ, राखाल ये सब नित्यसिद्ध और ईश्वरकोटि के हैं । इनकी जो शिक्षा होती है वह बिना प्रयोजन के ही होती है । तुम देखते नहीं, नरेन्द्र किसी की ‘केयर’(परवाह) नहीं करते ? मेरे साथ वह कप्तान की गाड़ी पर जा रहा था । कप्तान ने उसे अच्छी जगह पर बैठने को कहा, परन्तु उसने उस तरफ देखा तक नहीं । वह मेरा ही मुँह नहीं ताकता ।
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फिर जितना जानता है उतना प्रकट नहीं करता – कहीं मैं लोगों से कहता न फिरूँ कि नरेन्द्र इतना विद्वान है । उसके माया-मोह नहीं है – मानो कोई बन्धन ही नहीं है । बड़ा अच्छा आधार है । एक ही आधार में बहुत से गुण रखता है – गाने-बजाने, लिखने-पढ़ने सब में बहुत प्रवीण है । इधर जितेन्द्रिय भी है – कहता है, विवाह नहीं करूँगा ! नरेन्द्र और भवनाथ इन दोनों में बड़ा मेल है – जैसा स्वामी-स्त्री में होता है । नरेन्द्र यहाँ ज्यादा नहीं आता । यह अच्छा है । ज्यादा आने से मैं विव्हल हो जाता हूँ ।
(क्रमशः)

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