शनिवार, 5 सितंबर 2020

विचार का अंग २/५

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग २/५)
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*॥ प्रज्ञान परिचय ॥*
*दादू जल में गगन, गगन में जल है, पुनि वै गगन निरालं ।*
*ब्रह्म जीव इहिं विधि रहै, ऐसा भेद विचारं ॥२॥*
इस पद्य में श्रीदादूजी महाराज ने जीव, ईश्वर और ब्रह्म का विचार किया है । जैसे जल में आकाश का प्रतिबिम्ब दीखता है, वह प्रतिबिम्ब जल से कभी गीला नहीं होता, व्यापक आकाश में भी वर्षा के द्वारा अनुमान किया हुआ जल मौजूद है अन्यथा आकाश से जल की वर्षा कैसे होती । अतः मानना होगा कि आकाश में जल है, उस जल में भी प्रतिबिम्बित आकाश जल से गीला नहीं होता, इसी तरह जल के बाहर भीतर भी आकाश विद्यमान है, वहां भी वह आकाश जल से गीला नहीं होता । ऐसे ही स्थूल सूक्ष्म दोनों देहों का अधिष्ठान रूप से जो चैतन्य है वह कूट की तरह निर्विकार रूप से स्थित है, उसको कूटस्थ चैतन्य कहते हैं । उसमें कल्पित अन्तःकरण में जो चैतन्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी को जीव कहते हैं । उस जीव में ही सारा संसार हो रहा है । अनिर्वचनीय माया में जो चैतन्य का प्रतिबिम्ब है वह ईश्वर कहलाता है और जो किसी से भी अविच्छिन्न नहीं तथा व्यापक चैतन्य है उसको ब्रह्म कहते हैं । वह ब्रह्म चैतन्य जीव के सुख-दुःखादि तथा अल्पज्ञत्वादि धर्मों से कभी भी श्लिष्ट नहीं होता क्योंकि वह बिलकुल शुद्ध है । जीव में भी सुख दुःखादि तथा अल्पज्ञत्वादि धर्म तथा ईश्वर में सर्वज्ञत्वादि धर्म अज्ञान से ही कल्पित हैं, वास्तविक नहीं । अतः बाध सामानाधिकरण से या भागत्याग लक्षणा द्वारा ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यों द्वारा प्रतिपादित जीव ब्रह्म की एकता हो जाती है । वास्तविक सुख दुःखादि को मानने पर तो श्रुति प्रतिपादित एकता असम्भव ही होती । संक्षेप शारीरिक में कार्य(अन्तःकरण) को जीव की उपाधि और अविद्या को ईश्वर की उपाधि मानकर उसमें प्रतिबिम्बित चैतन्य को लेकर उपाधिभेद से जीव ईश्वर का भेद माना है । अतः अविद्या में प्रतिबिम्बित चैतन्य ईश्वर है, अन्तःकरण में प्रतिबिम्बित चैतन्य ही जीव है और शुद्ध बिम्ब स्वरूप ब्रह्म है । यदि कोई शंका करे कि- 
अविद्यावच्छिन्न चैतन्य को जीव, मायावच्छिन्न चैतन्य को ईश्वर क्यों नहीं मान लिया जाय? प्रतिबिम्ब की कल्पना क्यों की जाती है? ऐसा करने से गौरव दोष आयेगा? जैसे घट से अवच्छिन्न आकाश को घटाकाश कहते हैं, ऐसे ही अन्तःकरण और अविद्या से चैतन्य का अवच्छेद होने से जीव ईश्वर की सिद्धि हो जायेगी फिर प्रतिबिम्ब की कल्पना से गौरव दोष होगा? ऐसा कहना युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा मान लेने पर कृतानि अकृताभ्यागम दोष की प्रसक्ति हो जायेगी । क्योंकि इस लोक परलोक में जीव भाव से जीव भिन्न-भिन्न होने से शरीर के द्वारा किये गये कर्मों का फल उस शरीरावच्छिन्न जीव को न मिलकर देवादिशरीरावच्छिन्न जीव को बिना कर्म किये ही फल भोगना पड़ेगा । क्योंकि पाप पुण्य करने वाला शरीर तो यहां ही नष्ट हो जायेगा और जो परलोक में शरीर मिला है उसने अभी कोई कर्म ही नहीं किये और बिना कर्म किये ही उसको फल भोगना पड़ेगा । प्रतिबिम्बवाद में यह दोष नहीं है क्योंकि उपाधि के गमनागमन से जैसे अवच्छेद्य का भेद होता है, वैसा प्रतिबिम्बवाद में भेद नहीं होता । जैसे सूर्य प्रतिबिम्बित जल से पूर्ण घट को देशान्तर में ले जाने पर भी आकाश में आना जाना नहीं बनता, वैसे ही अन्तःकरण का लोकान्तर में गमन होने पर भी तत्प्रतिबिम्बवाद चैतन्य का देशान्तर में गमन नहीं देखा जाता । 
विवेकचूड़ामणि में- जैसे पानी से भरे घड़े में सूर्य का प्रतिबिम्ब देखकर मूढ उस प्रतिबिम्ब को ही सूर्य मानता है, वैसे ही उपाधि में स्थित चिदाभास को ही मूढभ्रान्ति से अपने को ‘यह मैं हूँ’ ऐसा मानता है । किन्तु विद्वान् तो घट जल और उसमें प्रतिबिम्बित सूर्य, इन सबको त्यागकर इन तीनों का अवभासक स्वयं प्रकाश तथा इनसे तटस्थ अपने आपको शुद्ध चैतन्यरूप ही मानता है ।
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*ज्यों दर्पण में मुख देखिये, पानी में प्रतिबिम्ब ।*
*ऐसे आत्मराम है, दादू सब ही संग ॥३॥*
जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब दीखता है और जल में बादल नक्षत्रों सहित आकाश का प्रतिबिम्ब होता है वैसे ही अन्तःकरण में चैतन्य का आत्मस्वरूपेण जो प्रतिबिम्ब है, उसको ही जीव कहते हैं । तथा ब्रह्मचैतन्य के आश्रित जो माया है, उसमें जो चैतन्य का प्रतिबिम्ब है, उसको ईश्वर कहते हैं और वह सर्वव्यापक होने से सबके साथ है और वह ब्रह्म से अभिन्न है ।
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*जब दर्पण मांहि देखिये, तब अपना सूझै आप ।*
*दर्पण बिन सूझै नहीं, दादू पुन्य रु पाप ॥४॥*
दर्पण के होने पर ही मुख तथा उसमें रहने वाले कालापन, गौरापन आदि धर्म प्रतीत होते हैं उसके बिना नहीं दिखते । इसी प्रकार अन्तःकरण के द्वारा ही ब्रह्म का प्रतिबिम्बरूप जीवभाव प्रतीत होता है तथा उसमें प्रतीत होने वाला संसार दिखाई देता है । अन्तःकरण के अभाव में तो शुद्ध चैतन्य मात्र ब्रह्म ही है । अतः यह जीव भाव भी उपाधि के द्वारा प्रतीत होने से मिथ्या है । यदि यह कहो कि अहमर्थ जीव भी यदि मिथ्या होगा तो उसका अविनाशी ब्रह्म के साथ अभेद कैसे होगा? तो उसका समाधान यह है कि “अहं ब्रह्मास्मि” इस मन्त्र में अभेद में समानाधिकरण नहीं है, किन्तु बाधा में है । जैसे जो यह स्थाणु है, सो पुरुष है । यहाँ पर जब पुरुषत्व का बोध हो गया तो स्थाणुत्वबुद्धि अपने आप निवृत्त हो जाती है । ऐसे ही ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इस कथन से कूटस्थ ब्रह्म स्वरूप का बोध होने से अध्यस्त जो अहं का अर्थ जीव है, वह निवृत्त हो जाता है । यदि आप विवरण आदि ग्रन्थों के अनुसार अभेद में ही समानाधिकरण मानते हैं तो फिर जीववाची अहं शब्द की कूटस्थ में लक्षणा कर लें, जिससे कूटस्थ तो अध्यस्त है नहीं, उसके साथ ब्रह्म की एकता संभव है । इसीलिये लिखा है-
“जैसे घटाकाश और महाकाश कभी अलग नहीं होते, उसी प्रकार कूटस्थ और ब्रह्म का भी कभी भेद नहीं होता और जो भेद प्रतीत हो रहा है, वह केवल नाम मात्र का ही है जैसे घटाकाश और महाकाश का ।”
“मायारूपी कामधेनु के जीव ईश्वर दोनों ही बछड़े हैं, अतः अपनी इच्छानुसार द्वैत की कल्पना करते रहो, तत्त्व तो एक अद्वैत ही है ।” ब्रह्मसूत्र में भी लिखा है कि- ‘उपाधिभेद से वास्तविक, भेद नहीं होता, जैसे आकाश का ।’ 
*॥ ज्ञान परचै ॥*
*जीयें तेल तिलनि में, जीयें गंध फुलनि ।*
*जीयें माखणु खीर में, ईयें रब्ब रूहनि ॥५॥*
जैसे तिलों में तेल, फूलों में गन्ध और दूध में घृत सर्व व्यापक है, वैसे ही ब्रह्म सब प्राणियों के मध्य में व्यापक विराजमान है । 
श्रुति में लिखा है – जो सब प्राणियों में रहता हुआ सब के अन्दर है, लेकिन उसको कोई भी प्राणी नहीं जानता सब प्राणी ही जिसके शरीर हैं ।
(क्रमशः)

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