रविवार, 6 सितंबर 2020

*वाणी को विनाणी३*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏 
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*सोई बड़भागी सदा सुहागी,* 
*परगट प्रीतम संग भये ।* 
*दादू भाग बड़े वर वर कर,* 
*सो अजरावर जीत गये ॥* 
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ७४)* 
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ* 
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami* 
*मनहर-* 
*अंगीकार आप अविनाशी जा को करत है,* 
*सोई अति जान परवीन सु प्रसिद्धि है ।* 
*सोई अति चेतन चतुर चहूँ१ चक२ मध्य,* 
*वाणी को विनाणी३ विसतार जैसे दधि४ है ।* 
*सोई अति कोमल कुलीन है कृतज्ञ विज्ञ५,* 
*ऋद्धि सिद्धि भगति मुकति वाके मधि है ।* 
*राघो कहै रामजी के भाव सौं भगत भण६,* 
*बात तेरी जै है बण वाणी तेरी वृधि है ॥२४॥* 
अविनाशी परमात्मा स्वयं जिस को स्वीकार कर लेते हैं, वही सब कुछ जानने में अति प्रवीण और सुप्रसिद्ध माना जाता है । 
वही पृथ्वी२ की चारों१ दिशाओं में अति सावधान और चतुर कहलाता है । वही विज्ञानी३ होता है । उसी की वाणी का विस्तार समुद्र४ के समान होता है । 
वही अति कोमल, कुलीन, दूसरे के किये हुये उपकार को मानने वाला कृतज्ञ और विद्वान्५ समझा जाता है । उसके अन्तःकरण में ऋद्धि सिद्धि भक्ति और मुक्ति के साधन विद्यमान रहते हैं अर्थात् ऋद्धि आदि के साधन वो जानता है । 
राघवदास जी अपने मन को कहते हैं- रामजी के समान ही ऐसे संतों में श्रद्धा-भाव रख के उनका यश कथन६ कर तब तो तेरी बात सब लोकों में बन ही जायगी अर्थात् अच्छी मानी जायगी और तेरी वाणी की वृद्धि भी होगी अर्थात् अधिक रूप में पढ़ी भी जायगी ।
(क्रमशः)

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