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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थोल्लास” १/३)*
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*ज्ञान माणकदास राजा को ज्ञान वैराग्य का उपदेश*
*अब गुरु जी आज्ञा दीजै,*
*बनो बाग में सुमिरण कीजै ।*
*उभै अष्ट वर्ष घर में रहो,*
*कहै राव ऐसे जनि कहो ॥१॥*
राजा ने कहा हे गुरुजी अब आज्ञा दीजिये बाग में सुन्दर स्थान बना है उसमें प्रभु स्मरण करूं । संतों ने कहा दोनों आठ वर्ष तक घर में रहकर सुमरण करौ, राजा ने कहा इस प्रकार क्यों ॥१॥
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*सुमिरण भजन साहिब घर मांहि,*
*बनौं वास बैठा कहु नांही ।*
*घर में जीतौ मोह माया को,*
*लोभ स्वाद तजो काया को ॥२॥*
गुरुजी ने कहा कि ईश्वर भजन तो साहिब के घर अर्थात् हृदय में होता है, वन में निवास करने से कछु नहीं होता । घर में रहकर मोह माया को जीतों और शरीर के लोभ और इन्द्रिय स्वाद को जीतो ॥२॥
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*काम क्रोध छाडो अहंकारा,*
*रहो निरबन्ध मिथ्या संसारा ।*
*हले न चले निर्गुण परमेश्वर,*
*जा को सुमिरे ब्रह्मा ईश्वर ॥३॥*
घर में रहते हुये ही काम, क्रोध, अहंकार आदि मानसिक दोषों को छोडो अविद्या एवं माया के बन्धन से मुक्त होकर रहो और इस संसार को स्वप्न वत मिथ्या व नाशवान समझो निर्गुण निरंजन परमेश्वर ब्रह्म न हिलता है, न चलता है उस ब्रह्म का ब्रह्मा विष्णु महेश्वर भी स्मरण जप करते हैं ॥३॥
(क्रमशः)

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