सोमवार, 21 सितंबर 2020

= ११९ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बिन ही पावक जल मुवा, जवासा जल मांहि ।*
*दादू सूखै सींचतां, तो जल को दूषण नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निगुणा का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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एक मनुष्य ने तप किया । उसके इष्ट ने उसे कहा वर मांग । वह बोला - "जो मैं इच्छा करूं वही मुझे प्राप्त हो जाय ।" यही वर दें ।" देवता - "ऐसा ही होगा किन्तु तेरे पड़ोसी को दुगना प्राप्त होगा ।" उसने जितना धन चाहा उससे दुगुना पड़ोसी को मिल गया । यह इसे सहन न हुआ । इससे पड़ोसी को अंधा करने की लिये इच्छा की कि - "मैं काणा हो जाऊं" वह काणा हो गया और पड़ोसी अन्धा हो गया । इत्यादिक विपरीत भावना करके वह स्वंय ही नष्ट हो गया ।
सह न सके पर उन्नति, ईर्ष्यालु सत जान ।
करने अंधे पड़ोसि को, आप हो गया कान ॥२१९॥

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