सोमवार, 21 सितंबर 2020

*ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय*

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*दादू हरि साधु यों पाइये, अविगति के आराध ।*
*साधु संगति हरि मिलै, हरि संगति तैं साध ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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(५)
*ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय*
यह कहकर श्रीरामकृष्ण एकाएक कमरे से उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में चले गये । कप्तान और अन्य भक्त कमरे में ही बैठे उनकी प्रतीक्षा करने लगे । मास्टर भी उनके साथ बरामदे में आये । बरमदे में नरेन्द्र हाजरा से बातें कर रहे थे । श्रीरामकृष्ण जानते थे कि हाजरा को शुष्क ज्ञानविचार बड़ा प्यारा है; वे कहा करते हैं, ‘जगत् स्वप्नवत् है, पूजा और चढ़ावा आदि सब मन का भ्रम है, केवल अपने यथार्थ रूप की चिन्ता करना ही हमारा लक्ष्य है, और मैं ही वह परमात्मा हूँ – सोऽहम् ।’ 
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श्रीरामकृष्ण(हँसते हुए)- तुम लोगों की क्या बातचीत हो रही है ?
नरेन्द्र(हँसते हुए)- कितनी लम्बी लम्बी बातें हो रही हैं ।
श्रीरामकृष्ण(हँसते हुए)- किन्तु शुद्ध ज्ञान और शुद्धा भक्ति एक ही है । शुद्ध ज्ञान जहाँ ले जाता है वहीँ शुद्धा भक्ति भी ले जाती है । भक्ति का मार्ग बड़ा सरल है । 
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नरेन्द्र- ‘ज्ञानविचार का और प्रयोजन नहीं माँ, अब मुझे पागल बना दो !’ (मास्टर से) देखिये, हैमिल्टन की एक किताब में मैंने पढ़ा – ‘A learned ignorance is the end of Philosophy and beginning of Religion.’
श्रीरामकृष्ण(मास्टर से)- इसका अर्थ क्या है ?
नरेन्द्र- दर्शनशास्त्रों का पठन समाप्त होने पर मनुष्य पण्डितमूर्ख बन बैठता है; और ‘धर्म धर्म’ करने लगता है । तब धर्म का आरम्भ होता है ।
श्रीरामकृष्ण(हँसते हुए)- थैंक यू, थैंक यू(धन्यवाद, धन्यवाद) । 
(सब लोग हँसे ।)
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(६)
*नरेन्द्र के अनेक गुण*
थोड़ी देर में सन्ध्या होते देखकर अधिकांश लोग अपने अपने घर लौटे । नरेन्द्र ने भी बिदा ली ।
दिन ढलने लगा । सन्ध्या होने ही वाली है । देवस्थान में चारों ओर बत्तियाँ जलाने का प्रबन्ध होने लगा । कालीमन्दिर और विष्णुमन्दिर के पुजारी गंगाजी में अर्धनिमग्न होकर अंतर्बाह्य शुद्धि कर रहे हैं – शीघ्र की आरती करनी होगी तथा देवताओं को रात्रिकालीन नैवेद्य चढ़ाना होगा ।
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दक्षिणेश्वर ग्राम के निवासी युवकगण बगीचे में टहलने आए हुए हैं – किसी के हाथ में छड़ी है, तो कोई मित्रों के साथ घूम रहा है । वे लोग गंगा के किनारे पुश्ते पर टहल रहे हैं तथा पुष्पों की सुगन्ध से भरे निर्मल सन्ध्या-समीरण का आनन्द लेते हुए श्रावण की गंगा के तरंगमय प्रवाह को देख रहे हैं । उनमें से जो कुछ चिन्तनशील हैं वे पंचवटी की निर्जन भूमि में अकेले टहल रहे हैं । भगवान् श्रीरामकृष्ण भी पश्चिमवाले बरामदे से थोड़ी देर के लिए गंगादर्शन करने लगे । 
(क्रमशः)

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