गुरुवार, 3 सितंबर 2020

*(“तृतीयोल्लास” ५७/५९)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
*(“तृतीयोल्लास” ५७/५९)* 
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*ता साहिब को सिर परि राखौ,*
*मिथ्या वचन कछु मत भाखो ।* 
*राव विप्र दुहुंवनि सुख पायो,*
*दादुर जलत सिंध में आयो ॥५७॥* 
ज्ञान व माणक ने कहा कि उस अविचल साहब को ही अपने शिर पर ध्यान में रखो, कभी भी झूंठ वचन मत बोलो राव और विप्र दोनों ही संतों का सत्संग पाकर मगन अवस्ता में हो गये और बहुत सुख आनन्द प्राप्त किया जिस प्रकार जलता हुआ मेंढक समुद्र में जाकर सुख प्राप्त करता है ॥५७॥ 
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*संतों की महिमा अपार है*
*‘धनि धनि’ राई विप्र सुनावै,*
*रामकृपा कहां लौं गावे ।* 
*बखान करत आवै मोहि शर्मू,*
*संतनि का को लखि है मरमू ॥५८॥* 
राव और विप्र ने धन्य है धन्य है ऐसा संतों से कहा और राम कृपा का कहां तक गुणगान करें । इनका बखान करते हम को शर्म आती है क्योंकि पहले हम अंधविश्‍वास में थे संतों का रहस्य कौन समझ सकता है अति कठिन है ॥५८॥ 
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*पूर्व पुण्य तैं पाइये, हरिजन को सत्संग ।* 
*मिश्री पाणी लौन पुनि, मिल्यो अंग में अंग ॥५९॥* 
पूर्व पुण्य के प्रभाव से ही संतों व हरिजनों का सत्संग प्राप्त होता है और जिस प्रकार मिश्री व नमक जल में पूर्ण विलीन हो जाता है उसी प्रकार सत्संग से जीव व ब्रह्म एक हो जाते हैं ॥५९॥ 
इति धरयाजु जयमल पदमसिंघ गजसंवाद ज्ञानदास माणिकदास विप्रनाम वर्णन । 
॥ इति तृतीयोल्लास संपूर्ण ॥३॥ 
(क्रमशः)

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