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🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*माया देखे मन खुशी, हिरदै होइ विकास ।*
*दादू यहु गति जीव की, अंत न पूगै आस ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *कृपणता*
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एक कृपण किसी वस्तु की आवश्यकता होने पर एक रुपया मुठ्ठी में लेकर बाजार गया । दुकानदार से भाव पूछ कर बोला - "बहुत तेज भाव है मैं तुमसे न लूंगा ।" आगे चला और मुठ्ठी खोलकर रुपये को देखा । हाथ में पसीना आ गया था इससे उसने समझा रुपया रो रहा है, आप भी रोने लगा और बोला - "मोर भइयन ! रोओ मत, मोर भानों तोर न भानों ।" अर्थात मर जाऊँगा तुझे न तुड़ाऊँगा । यह कह कर पीछा ही घर आ गया ।
कृपण देह से भी अधिक, रुपये को दे मान ।
कर में लख कर स्वेद को, होता अधिक मलान ॥६३॥

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