शनिवार, 12 सितंबर 2020

*ईश्वरदर्शन की बात । जीवन का उद्देश्य*

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*दादू भक्त कहावैं आपको, भक्ति न जानैं भेव ।*
*सुपनै ही समझैं नहीं, कहाँ बसै गुरुदेव ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*

*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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*परिच्छेद ४८* 
*बलराम के मकान पर* 
*ईश्वरदर्शन की बात । जीवन का उद्देश्य* 
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एक दिन, १८ अगस्त १८८३ ई., शनिवार को तीसरे पहर श्रीरामकृष्ण बलराम के घर आए हैं । आप अवतार-तत्त्व समझा रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(भक्तों के प्रति)- अवतार लोकशिक्षा के लिए भक्ति और भक्त लेकर रहते हैं । मानो छत पर चढ़कर सीढ़ी से आते-जाते रहना । जब तक ज्ञान नहीं होता, जब तक सभी वासनाएँ नष्ट नहीं होतीं, तब तक दूसरे लोग छत पर चढ़ने के लिए भक्तिपथ पर रहेंगे । सब वासनाएँ मिट जाने पर ही छत पर पहुँचा जा जाता है । दुकानदार का हिसाब जब तक नहीं मिलता, तब तक वह नहीं सोता । खाते का हिसाब ठीक करके ही सोता है !
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(मास्टर के प्रति) “मनुष्य यदि डुबकी लगाए तो अवश्य सफल होगा । डुबकी लगाने पर सफलता निश्चित है ।
“अच्छा, केशव सेन, शिवनाथ, - ये लोग जो उपासना करते हैं, वह तुम्हें कैसी लगती है ?”
मास्टर- जी, जैसा आप कहते हैं, - वे बगीचे का ही वर्णन करते हैं, परन्तु बगीचे के मालिक के दर्शन करने की बात बहुत कम कहते हैं । प्रायः बगीचे के वर्णन से ही प्रारम्भ और उसी में समाप्ति हो जाती है ।
श्रीरामकृष्ण- ठीक । बगीचे के मालिक की खोज करना और उनसे बातचीत करना, यही असल काम है । ईश्वर का दर्शन ही जीवन का उद्देश्य है ।* (*आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः । - बृहदारण्यक उपनिषद् २/४/५ )
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बलराम के घर से अब अधर के घर पधारे हैं । सायंकाल के बाद अधर के बैठकघर में नाम-संकीर्तन और नृत्य कर रहे हैं; कीर्तनकार वैष्णवचरण गाना गा रहे हैं । अधर, मास्टर, राखाल आदि उपस्थित हैं ।
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कीर्तन के बाद श्रीरामकृष्ण भाव में विभोर होकर बैठे हैं । राखाल से कह रहे हैं, “यहाँ का जल श्रावण मास का जल नहीं है । श्रावण मास का जल काफी तेजी के साथ आता है और फिर निकल जाता है । यहाँ पर पाताल से निकले हुए स्वयम्भू शिव हैं, स्थापित किए हुए शिव नहीं हैं । तू क्रोध में दक्षिणेश्वर से चला आया; मैंने माँ से कहा, ‘माँ, इसके अपराध पर ध्यान न देना ।’
क्या श्रीरामकृष्ण अवतार हैं ? स्वयम्भू शिव हैं ?
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फिर भावविभोर होकर अधर से कह रहे हैं – “भैया, तुमने जो नाम लिया था, उसी का ध्यान करो ।” ऐसा कहकर अधर की जिव्हा अपनी उँगली से छूकर उस पर न जाने क्या लिख दिया । क्या यही अधर की दीक्षा हुई ? 
(क्रमशः)

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