शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

विचार का अंग २६/२९

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग २६/२९)
.
*दादू दिन दिन भूलै देह गुण, दिन दिन इंद्रिय नाश ।*
*दिन दिन मन मनसा मरै, दिन दिन होइ प्रकाश ॥२६॥* 
हरिस्मरण से देहादिगुण, इन्द्रियों की चंचलता मन की वासना भी नष्ट हो जाती है । प्रतिदिन ज्ञान की भी वृद्धि होती रहती है वासिष्ठ में- “लोक में जितने दुःख, जितनी दुःसह तृष्णाएं और जितनी दुःखदायिनी मानसिक व्यथाएं हैं, वे सब शान्तचित्त वाले पुरुषों के निकट जाकर वैसे ही विलिन हो जाती हैं, जैसे सूर्य की किरणों के संपर्क से अन्धकार का नाश हो जाता है ।”
.
*॥ सजीवन ॥*
*देह रहै संसार में, जीव राम के पास ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥२७॥*
जीवन्मुक्त महात्मा संसार में व्यवहार करता हुआ भी मन के द्वारा ब्रह्म में रमण करता रहता है । इसलिये कालसदृश दुःखों से भी वह कभी व्यथित नहीं होता, किन्तु साक्षी की तरह रहता है । 
वासिष्ठ में- “महापुरुषों की विवेक विचार से विकसित हुई बुद्धियाँ विपत्ति में कभी नहीं डूबती हैं, जैसे पानी में तूम्बी नहीं डूबती । बड़ी-बड़ी आपत्तियाँ जो दीर्घकाल तक आती रहती हैं, उनमें तथा अज्ञानजन्य मोह में सद्विचारवान् मनुष्य कभी भी नहीं डूबता, जैसे सूर्य कभी अन्धकार में नहीं डूबता । आपत्ति एक महान् वन है, क्योंकि वह दुरुत्तर है । अनन्त प्रकार की प्रवृत्तियों से यह आपत्तिरूप वन पल्लवित होता हुआ रागादि दोषों से निरन्तर बढ़ता ही रहता है । विचाररूपी आरे से इस आपत्तिरूपी वन को काट दिया जाय तो फिर यह अंकुरित नहीं होता ।”
.
*काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि ।*
*दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥२८॥*
जो साधक शरीर के अध्यास को त्यागकर परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है, उसके अन्तःकरण में कामक्रोध आदि दोषों की स्फुरणा भी नहीं होती, किन्तु संसार में निर्भय होकर व्यवहार करता है । 
योगवासिष्ठ में लिखा है- “ज्ञानी पुरुष जगत के विषयों को उदासीन बुद्धि से देखता हुआ भी उनमें रागद्वेष बुद्धि से अपने को नहीं लगाता और सत्य बुद्धि से उनको ग्रहण नहीं करता तथा पुरुषार्थ बुद्धि से उनको भोगता नहीं और सुषुप्ति की तरह उपाधि के शान्त होने से शान्त ही रहता और स्वप्न की तरह अन्तःकरण की वासना में डूबता नहीं । जाग्रत में मूढ़ मनुष्यों की तरह बाह्य पदार्थों के लिये दुःखी नहीं होता और न कर्म किये बिना रहता और न कर्म में डूबता । न अप्राप्य वस्तु की आकांक्षा करता, न प्राप्त का परित्याग ही करता । विचारशील मनुष्य गई हुई वस्तु की उपेक्षा कर देता है, प्राप्त वस्तु का शास्त्रानुसार उपभोग करता है और मन की प्रतिकूलता में क्षुब्ध नहीं होता, अनुकूलता में प्रसन्न नहीं होता, किन्तु जल से परिपूर्ण सागर की तरह सुशोभित होता है । जैसे समुद्र लक्ष्मी, कौस्तुभमणि आदि की उपेक्षा ही करता है और इच्छा नहीं करता । ऐसा ही ज्ञानी का व्यवहार होता है अर्थात् साक्षी की तरह रहता है ।”
.
*काया मांही भय घणा, सब गुण व्यापैं आइ ।*
*दादू निर्भय घर किया, रहे नूर में जाइ ॥२९॥*
जब तक देह का अध्यास दूर नहीं होता तब तक इस शरीर में जन्म मरण का भय भी दूर नहीं होता, सात्विक गुण भी नहीं आते, और न काम क्रोध आदि नष्ट होते । जब निर्भय होकर परमात्मा में मन विलिन हो जाता है, तब आत्मा में मन के लीन होने के कारण कोई भी विकार ज्ञानी पर आक्रमण नहीं कर सकते । 
वासिष्ठ में लिखा है – “विचार द्वारा जिनकी बुद्धि विशुद्ध हो गई, वे मनुष्य नाना प्रकार के दुःखरूप गड्ढों में बारबार नहीं गिरते । अर्थात् आवागमन से मुक्त हो जाते हैं । सैंकड़ों अनर्थों के संयोग से जिसका शरीर जर्जर हो गया है तथा रोगग्रस्त है, वह वैसा रुदन नहीं करता जैसा कि वह मूर्ख विलाप करता है । जिसने विचारहीनता से आत्मा का हनन कर दिया ।” 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें