शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

*समाधि में जगन्माता के साथ वार्तालाप*

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*नारद गावें गुण गोविन्द,*
*करैं शारदा सब ही छंद ।*
*नटवर नाचै कला अनेक,*
*आपन देखै चरित अलेख ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३९१)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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(४)
*समाधि में जगन्माता के साथ वार्तालाप* 
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एक दूसरे दिन श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में अपने कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे की सीढ़ी पर बैठे हैं । साथ में राखाल, मास्टर तथा हाजरा हैं । श्रीरामकृष्ण हँसी हँसी में बचपन की अनेक बातें कह रहे हैं ।
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सायंकाल हुआ । श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हैं । अपने कमरे में छोटे तख्त पर बैठे जगन्माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं । कह रहे हैं, “माँ, तू इतना झमेला क्यों करती है ? माँ, क्या मैं वहाँ पर जाऊँ ? यदि तू ले जाएगी तो जाऊँगा ।” श्रीरामकृष्ण का किसी भक्त के घर पर जाना तय हुआ था । क्या वे इसीलिए जगन्माता की आज्ञा के लिए इस प्रकार कह रहे हैं ?
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जगन्माता के साथ श्रीरामकृष्ण फिर वार्तालाप कर रहे हैं । सम्भव है अब किसी अन्तरंग भक्त के लिए प्रार्थना कर रहे हैं । कह रहे हैं, “माँ, उसे शुद्ध बना दो । अच्छा माँ, उसे एक कला क्यों दी ?”
श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप हैं । फिर कह रहे हैं, “ओफ ! समझा इसी से तेरा काम होगा ।” सोलह कलाओं में से एक कला शक्ति द्वारा तेरा काम अर्थात् लोकशिक्षा होगी – क्या श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं ?
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अब भावविभोर स्थिति में मास्टर आदि से आद्याशक्ति तथा अवतार-तत्त्व के सम्बन्ध कह रहे हैं –
“जो ब्रह्म है, वही शक्ति है । मैं उन्हीं को माँ पुकारता हूँ । जब वे निष्क्रिय रहते हैं तब उन्हें ब्रह्म कहते हैं, और जब वे सृष्टि, स्थिति, संहार कार्य करते हैं, तब उन्हें शक्ति कहते हैं । जिस प्रकार स्थिर जल और हिलता-डुलता जल । शक्ति की लीला से ही अवतार होते हैं । अवतार प्रेम-भक्ति सिखाने आते हैं । अवतार मानो गाय का स्तन है । दूध स्तन से ही मिलता है । मनुष्य रूप में वे अवतीर्ण होते हैं ।”
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कोई कोई भक्त सोच रहे हैं, क्या श्रीरामकृष्ण अवतारी पुरुष हैं, जैसे श्रीकृष्ण, चैतन्यदेव, ईसा ? 
(क्रमशः)

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