मंगलवार, 8 सितंबर 2020

= ३६५ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग वसँत २३(गायन समय प्रभात ३ से ६ तथा वसँत ॠतु)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
३६५ - (गुजराती) **विरह** । धीमा ताल
तूँ घर आवने१ माहरे रे, हूं जाउँ वारणे ताहरे रे ॥टेक॥
रैन दिवस मूनै निरखतां जाये,
वेलो२ थई३ घर आये रे वाहला४ आकुल थाये५ ॥१॥
तिल तिल हूं तो ताहरी वाटड़ी जोऊं,
एने६ रे आंसूड़े वाहला मुखड़ो धोऊं ॥२॥
ताहरी दया करि घर आये रे वाहला,
दादू तो ताहरो छे रे मा८ कर टाला७ ॥३॥
विरह दिखा रहे हैं - हे प्रभो ! आप मेरे घर पधारिये१, मैं आपकी बलिहारी जाता हूं । 
.
आप मुझे रात्रि दिन विरह - व्यथा में देखते जा रहे हैं, फिर भी क्यों नहीं आते ? प्रियतम४ ! बहुत समय२ व्यतीत हो गया३, अब तो पधारिये । आपके बिना मेरा मन व्याकुल हो रहा५ है । 
.
मैं तो प्रति क्षण आपका मार्ग देख रहा हूं और प्रियतम ! इन६ विरह अश्रुओं से अपना मुख धो रहा हूं । 
.
प्रियतम ! अन्य प्रकार से आप न आ सकें तो अपनी दया करके ही मेरे घर पधारें । मैं तो आपका ही हूं, कोई बहाना७ करके मुझ से अलग मत८ रहिये ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें