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*चलु रे मन ! जहाँ अमृत वना,*
*निर्मल नीके संत जना ॥*
*निर्गुण नांव फल अगम अपार,*
*संतन जीवन प्राण अधार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २००)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*ॐ चतुर निगम षट् शास्त्र, गीता रु वसिष्ठ बोधय ।*
*वाल्मीकि कृत व्यासकृत, जपै जो कर हि निरोधय ॥*
*प्रथम आदि नव नाथ, भण हु चतुरासी सिद्धय ।*
*सहस अठ्यासी ऋषिसु, सुमरि पुनरपि कवि विद्धय ॥*
*सिध साधक सुर नर असुर, सब मुनि सकल महंत ।*
*सभी अर्ज अवधारिज्यो, जन राघवदास कहंत ॥२३॥*
शब्द ब्रह्मरूप ओंकार का, ऋग्वेग, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वणवेद, इन चारों वेदों का, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त इन षट् शास्त्रों का, गीता और वसिष्ठ ऋषि का बोध रूप योग वासिष्ठ, वाल्मीकि रचित रामायणादि, व्यास रचित महाभारतादि और उक्त सब का मन निरोध के लिये वर्णन करते हैं, उन सब का तथा ....
पहले जो आदि नवनाथ हुये और चौरासी सिद्ध कहे जाते हैं उनका, अठ्यासी हजार ऋषियों का और फिर भी सब कविजन का, ....
अन्य सब सिद्ध, साधक, देव, नर, असुर, सर्व मुनि और सर्व आचार्यों का स्मरण करके आप सबका सेवक मैं राघवदास आप सब से प्रार्थना करता हूँ वह आप अवश्य ग्रहण करेंगे । मेरा भक्तमाल निर्विघ्न होकर लोकप्रिय होना चाहिये, यही मेरी प्रार्थना है ।
(क्रमशः)

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