शनिवार, 5 सितंबर 2020

*५. परचा कौ अंग ~ ३६१/६४*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ ३६१/६४*
मिनखा४ सरीखी देह करि, देह बिदेह समांन । 
कहि जगजीवन प्रेम रस, सहज करै ये पांन ॥३६१॥ 
(४. मिनखां - मनुष्यों के समान) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु ने मनष्यों जैसी देह में भी वे विदेह है । और इस प्रकार वे सहज रुप से प्रेमरस का पान करते हैं । 
देह तुम्हारी तेज की, ए देही हरि खाख । 
कहि जगजीवन रांमजी, मति कहुँ लागै चाख ॥३६२॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है प्रभु आपकी देह तेज है और हमारी राख है । संत कहते हैं कि इसका तो कभी आस्वाद भी न कोइ करे । 
एही मुख एही रसन, एही श्रवन एही सास । 
एही नेत्र खंड खुलै, सु कहि जगजीवनदास ॥ ३६३॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह ही मुख यह ही रसना ये ही कान यह ही श्वास ये ही नेत्र सब आपकी और खुले रहें । 
घट घट एही घाट हरि, सबद मांहि सुख बास । 
जे जांणै सो मिलि रहै, सु कहि जगजीवनदास ॥३६४॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह हृदय ही हरि का घाट बने शब्दों कि सुन्दर सुवास हो । जो इस तथ्य को जानते हैं वे ही प्रभु से मिलते है ।
(क्रमशः)

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