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*मूसा जलता देख कर, दादू हंस दयाल ।*
*मान सरोवर ले चल्या, पंखा काटे काल ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कृतघ्नी निगुणा का अंग १२४*
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अविगत१ आदित्य की सता२, आतम आँखों माहिं ।
पै कृतघ्नी सारी उमर, इष्टों देखै नाँहि ॥९॥
नेत्रों में सूर्य की ही सत्ता२ है, नेत्र उसी से देखते हैं किन्तु जीवन भर भी सूर्य के सामने नहीं देखते । वैसे ही जीवात्मा में ब्रह्म१ की सत्ता है उसी से जीव सब कुछ करता है फिर भी कृतघ्न जीव अपनी संपूर्ण आयु में भी अपने इष्ट ब्रह्म का उपकार नहीं देखता ।
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मूंस१ पलटि मंजार२ किये, पुन: श्वान सिंह साज ।
तो कहा५ सेवड़े सुख लह्या६, गत३ गुण चोर निवाज४ ॥१०॥
किसी सेवड़े के पास एक चूहा१ पर बिलाई ने हमला किया, उसे देखकर सेवेड़े को दया आ गई, उसने बिलाई को रोक कर चूहे को भी बिलाव२ बना दिया और वह सेवड़े के पास ही रहने लगा । एक दिन बिलाव पर कुत्ते ने हमला किया, सेवड़े ने उसे बचा कर कुत्ते को सिंह बना दिया, फिर सिंह सेवड़े को ही खाने लगा, तब सेवड़े ने उसे पुन: चूहा बना दिया । देखो, उस शुभ गुण रहित३ गुण चोर और कृतघ्न पर कृपा४ करके सेवड़े ने क्या५ सुख प्राप्त६ किया ? अत: कृतघ्न पर कृपा करना भी दु:ख मोल लेना है ।
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रज्जब खोटे जीव सौं, कछु गुण१ किया न जाय ।
केशरि२ काढ्यो कूपतैं, काढणहार हिं खाय ॥११॥
कृतघ्न बुरे प्राणी से भला१ तो कुछ भी नहीं किया जाता । देखो, किसी दयालु ने कूप में पड़े हुये सिंह२ को निकाल दिया तो वह निकालने वाले को ही खा गया ।
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जन रज्जब जग जीव जो, दे सदगुरु को पीठि ।
तो शक्ति१ सेन सांई सहित, घर हि दुष्टता दीठि२ ॥१२॥
जगत् में जो कृतघ्न जीव सदगुरु को पीठ देता है । तब माया१ रूप सेना के सहित ईश्वर भी उसमें दुष्टता की दृष्टि२ रखते हैं अर्थात उसमें दुष्टता आ जाती है ।
(क्रमशः)

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