बुधवार, 23 सितंबर 2020

*अवतारों के पद-चिन्ह*

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*काया माँही कर्तार है, सो निधि जानै नाँहिं ।*
*दादू गुरुमुख पाइये, सब कुछ काया मांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३५९)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*अवतारों के पद-चिन्ह* 
मूल छप्पय-
*अवतारन के अंध्रि१ द्वै,*
*इते चिन्ह नित प्रति वसै ॥ टे.*
*ध्वजा शंख षटकौंण,*
*जंबुफल चक्र पद्म जब ।*
*वज्र अम्बर अंकुश,*
*धेनुपद धनुष सु वासव२ ॥*
*सुधा-कुम्भ स्वस्तिक,*
*मच्छ बिन्दु त्रय कौंणा ।*
*अर्ध-चन्द्र अठ-कोण,*
*पुरुष उर्ध-रेखा होणा ॥*
*राघव साधु सुधारणा,*
*चरणन में अतिशय लसै ।*
*अवतारन के अंध्रि द्वै,*
*इते चिन्ह नित प्रति वसै ॥३४॥*
१.ध्वजा, २.शंख, ३.षट्कोण, ४.जामुन का फल, ५.चक्र, ६.कमल, ७.जौ, ८.वज्र, १०.अंकुश, ११.गो-पद, १२.इन्द्र धनुष, १३.अमृत-कलश, १४.स्वस्तिक, १५.मच्छ, १६.बिन्दु, १७.त्रय कोण, १८.अर्ध चन्द्रमा, १९.अष्ट-कोण, २०.पुरुष, २१.उर्ध्व-रेखा । संतों के सुधार रूप सहायता के लिये अवतारों के दोनों चरणों१ में उक्त २१ चिन्ह अतिशय शोभा देते हुये नित्य निवास करते हैं ।
(क्रमशः)

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