मंगलवार, 22 सितंबर 2020

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३७३ - **सद्गुरु तथा नाम महिमा** । त्रिताल ।
सतगुरु चरणाँ मस्तक धरणाँ, 
राम नाम कहि दूस्तर तिरणाँ ॥टेक॥
अठ सिधि नव निधि सहजैं पावै, 
अमर अभै पद सुख में आवै ॥१॥
भगति मुकति बैकुण्ठां जाइ, 
अमर लोक फल लेवै आइ ॥२॥
परम पदारथ मँगल चार, 
साहिब के सब भरे भँडार ॥३॥
नूर तेज है ज्योति अपार, 
दादू राता सिरजनहार ॥४॥
गुरु और नाम की महिमा बता रहे हैं - सद्गुरु के चरणों में शिर रख कर राम - नाम कहने से प्राणी दूस्तर सँसार से पार हो जाता है ।
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अनायास ही अष्टसिद्धि, नव निधि और अमर अभय पद को प्राप्त कर लेता है ।
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सब प्रकार के दु:खों से मुक्त होकर सुख में स्थित होता है ।
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परब्रह्म रूप परम पदार्थ प्राप्त होता है । अन्य भी सब प्रकार मँगल का ही व्यवहार होता है । कारण प्रभु के तो सभी वस्तुओं के भँडार भरे हैं, फिर उनके भक्त को क्या नहीं मिलेगा ?
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जो तेज स्वरूप हैं, जिनकी स्वरूप ज्योति अपार है, उन्हीं सृकर्ता प्रभु के स्वरूप में, हम सद्गुरु चरणों में मस्तक रखकर तथा नाम - चिन्तन करके ही अनुरक्त हुये हैं ।
(क्रमशः)

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