मंगलवार, 15 सितंबर 2020

विचार का अंग ३९/४२

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग ३९/४२)
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*दादू जब यहु मनहि मन मिल्या, तब कुछ पाया भेद ।*
*दादू लेकर लाइये, क्या पढ़ मरिये वेद ॥३९॥* 
जब साधक साधना द्वारा अन्तर्मुख मन वाला होता है, तब अपने मन में ही उस परमात्मा का रहस्य समझ में आ जाता है । केवल शास्त्रों के अध्ययन मात्र से नहीं ।
गीता में लिखा है- “हे अर्जुन ! जो तूने मेरा विराट् रूप देखा है, उसका दर्शन, वेदाध्ययन, तपस्या, दान, यज्ञ इनके द्वारा नहीं होता किन्तु मनुष्य के हृदय में इस प्रकार की भक्ति हो कि सब कुछ परमात्मा ही है, तब मेरा दर्शन उसको प्राप्त होता है । उसको समझना, देखना और उसमें प्रवेश हो जाना अर्थात् एकीभाव हो जाना, यह सब तब होता है जब जीवन में अनन्यभक्ति हो ।”
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*पाणी पावक, पावक पाणी, जाणै नहीं अजाण ।*
*आदि रु अंत विचार कर, दादू जाण सुजाण ॥४०॥*
जैसे जल से विद्युत् रूपी अग्नि पैदा होती है और अग्नि से जल, ऐसे ही सर्वकारण रूप ब्रह्म से सकल जगत् की उत्पत्ति होती है । विचार से सब जगत् का मिथ्यात्व विचारकर ज्ञान के द्वारा उसका अपवाद करने पर अभिन्ननिमित्तोपादानरूप से ब्रह्म का ज्ञान होता है । अतः सृष्टि के पहले कारण रूप से जगत् के बाध के बाद अधिष्ठान रूप से निषेध, शेष रूप से ब्रह्म का ज्ञान होता है ।
भागवत में लिखा है- समस्त स्थावर, जंगम पदार्थों के भीतर बाहर अपने को ज्ञान स्वरूप से उनका आधारभूत देखकर समस्त उपाधियों को छोड़कर अखण्ड पूर्णरूप से स्थित रहता है, वह मुक्त है ।
संसार बंधन से सर्वथा मुक्त होने के लिये सर्वात्मभाव(सबको आत्मस्वरूप से देखने का भाव) से बढ़कर और कोई हेतु नहीं है । निरन्तर आत्मनिष्ठा में रहने से दृश्य का अग्रहण(बाध) होने पर सर्वात्मभाव की प्राप्ति होती है । अतः संसार के आदि-अन्त के ज्ञान से साधक को ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना चाहिये ।
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*सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ ।*
*दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥४१॥*
विषयजन्य सुख के अन्त में जन्म-मरण आदि दुःख निश्चय ही मनुष्य को प्राप्त होते हैं और भजन करते समय जो तपश्चर्यादि जन्य कष्ट होता है उसको कष्ट नहीं मानना चाहिये क्योंकि अन्त में ब्रह्मानन्द सुख जो शाश्वत है, वह प्राप्त हो जाता है । ऐसा विचार द्वारा निश्चय करके भगवान् का ही भजन करना चाहिये । क्योंकि भजन के बाद जो सुख होगा, वह ही वास्तविक सुख है ।
गीता में लिखा है- “अरे, पहले जो ऐसा लगे कि यह तो विष की तरह महान् कष्ट है, लेकिन बाद में जिसका परिणाम अमृत तुल्य मधुर सुख की प्राप्ति है, वह सात्विक सुख है । जब आत्माकार बुद्धि निर्मल होती है तब अपनी बुद्धि की निर्मलता से ही इस सुख की प्राप्ति होती है और जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से पहले अमृत के तुल्य सुखकारक प्रतीत हो, परन्तु परिणाम में विष के तुल्य दुःख देने वाला हो, वह राजस सुख है । अतः भजन के द्वारा सुख प्राप्त होता है, वह मुक्ति का देने वाला होने से वास्तविक सुख है, उसी को प्राप्त करना चाहिये ।
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*मीठा खारा, खारा मीठा, जाने नहीं गँवार ।*
*आदि अंत गुण देखकर, दादू किया विचार ॥४२॥*
भोगकाल में विषयसुख प्रिय लगते हैं किन्तु परिणाम में रोगजनक होने से अन्त में सभी को अप्रिय लगने लगते हैं क्योंकि भोगों में रोग का भय है ? ऐसा विद्वानों ने कहा है । सुक्तिसुधाकर में भी कहा है कि रोग के बराबर कोई दुःख नहीं है । हां, इन्द्रियसंयम में पहले कष्ट मालुम पड़ता है, किन्तु परिणाम में शान्ति प्रतीत होती है, तब वह इन्द्रियसंयम हितकर मालूम होता है । परन्तु अज्ञानी को इस कर्म का क्या फल होगा, यह मालुम न होने से विषय सुखों में ही लगा रहता है । अतः बुद्धिमान् को चाहिये कि आदि-अन्त में परिणाम का विचार करके ही कार्य करना चाहिए अन्यथा बाद में पछताना पड़ेगा । लिखा है “चाहे अच्छा कर्म हो या बुरा, बुद्धिमान् को उसका परिणाम सोच कर ही करना चाहिये, क्योंकि जल्दबाजी में बिना सोचे समझे जो कर्म किया जाता है, वह मरणपर्यन्त हृदय में कांटे के चुभने जैसी पीड़ा तथा जलन पैदा करने वाला होता है ।”
(क्रमशः)

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