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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थोल्लास” २८/३०)*
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*हरिजन हंस नजीकन जाई,*
*अहर्निश मान सरोवर मांही ।*
*कहै राव, ‘‘कीजै उपगारा’’,*
*करौ बीनती अनेक ही वारा ॥२८॥*
हरि भक्त इस दुर्गन्धित माया के पास नहीं जाते वे तो सदा हरि भजन रूपी मानसरोवर में ही निरन्तर विचरण करते हैं । तब राजा ने कहा प्रार्थना की कि मैं अनेक बार आपसे प्रार्थना कर रहा हूं हम लोगो का उद्घार कर उपकार करिये ॥२८॥
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*राजा का दृढ़ भाव*
*चरण प्रछारूं रहूं हजूरी,*
*तुम्ह संग त्याग जाऊ नहीं दूरी ।*
*कथा करो उर भगति बढावौ,*
*करि है सेवा जो फरमावो ॥२९॥*
राजा कहता है मै आपके चरण सदा धोता रहूं और आपकी सेवा में उपस्थित रहूं आपकी संगति त्याग कर मैं दूर नहीं जा सकता । आप यहां हरि की कथा करो और हमारे हृदय में भक्ति भावना बढाओ, आप जो आज्ञा देंगे वही सेवा आपकी यहां होगी ॥२९॥
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*राजा की सख्त घोषणा देवी पूजा कोई नहीं करे*
*फिरै दुहाई देस मंझारी,*
*अब सब चलो लार हमारी ।*
*देवी पूजा जनि को करै,*
*संहित कुटुम्ब कोल्हू में परै ॥३०॥*
हे राजा शहर, देस में डूंडी पिटवा दो आदेश जारी कर दो कि सब लोग हमारे साथ चले । और जो आदमी परिवार देवी की पूजा करेगा उसे परिवार सहित कोल्हू तैल की घाणी में पिसवा दिया जायेगा ॥३०॥
(क्रमशः)

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