सोमवार, 7 सितंबर 2020

*६. जरणां कौ अंग ~ १/४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*६. जरणां कौ अंग ~ १/४*
.
कहि जगजीवन रांम हरि रटि, निरमल नाद जरंत ।
पांच१ पचीस२ रु तीन गुण३, हरि रस लीन करंत ॥१॥
(१. पांच - पञ्च महाभूत) {२. पचीस - पच्चीस तत्त्व(सांख्यमत में)} {३. तीन गुण - सत्त्व, रज, तम}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जरणा अर्थात समायी जिनमें होती है वे राम हरि का स्मरण करते रहते हैं । इससे वे पंच महाभूतों, व उनकी पच्चीस प्रकृतियों व तीन गुणों को भी समाहित कर प्रभु की ओर लगा लेते हैं ।
.
अविगत अलख अगाध लहै, जे नाद जरै भजि रांम ।
कहि जगजीवन कियां बिन, सरि आवै सब कांम ॥२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो अविगत अलख परमात्मा को पाकर, अनाहत ध्वनि राम से परिपूर्ण हो सुनते हैं, उनके सकल काम बिना प्रयास के ही हो जाते हैं ।
.
नाद बिलावै नांम रहै, नूर जरै निज संग ।
कहि जगजीवन जमन जल४, अंग मंहि उज्जवल गंग५ ॥३॥
(४. जमन जल - यमुना का जल) {५. गंग - गंगा(इडा-पिंगला की ओर संकेत है)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नाद भले ही दूर हो प्रभु नाम पास हो तो तेज की समायी रहती है संत कहते हैं कि ऐसी स्थिति में ईड़ा पिंगला नाड़ियां स्वतः ही अनुकूल हो जाती हैं ।
नाद भगति नाद हि भजन, नाद ही नांम बिलास ।
नाद समांना नाद मैं, सु कहि जगजीवनदास ॥४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिसके अतंर में अनाहत नाद है वह ही भक्ति व भजन है । वह ही स्मरण का ऐश्वर्य है और उसी में आनंद है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें