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*दादू राम रसायन भर धर्या, साधुन शब्द मंझार ।*
*कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मया१ दया करि हैं देवादिदेव दीन बन्धु,*
*तब कुछ ह्वै है बुद्धि वाणी की विमलता ।*
*जैसे शशि कार्तिक में स्त्रवता२ अमी असंख्य,*
*निखर३ के होत नीकी नीर की निर्मलता ।*
*रजनी का तिमिर तनक मध्य दूर होत,*
*दीसै वित्त४ वस्तु भाव दीपक हो जलता ।*
*राघो कहै जाकी वाणी सुण गुण५ होत सुधि६,*
*नीति के विचारे बिन धर्म नाहीं पलता ॥२५॥*
जब इन्द्रादि देवताओं के भी आदि देव, दीन बन्धु परमात्मा दया करके अनुग्रह१ करते हैं तब ही कुछ बुद्धि और वाणी की विमल अवस्था प्राप्त होती है अर्थात् बुद्धि और वाणी शुद्ध होती है ।
जैसे कार्तिक मास में चन्द्रमा अत्यधिक अमृत टपकाता५ है तब जल साफ३ होकर उसकी अच्छी निर्मलता भासने लगती है और पूर्णिमा के चन्द्रमा के प्रकाश से रात्रि का अन्धकार थोड़ी ही देर में दूर हो जाने से सब वस्तुयें भासने लगती हैं ।
वैसे ही बुद्धि निर्मल होने से भाव रूप दीपक प्रज्वलित हो जाता है फिर उसकी ज्ञान रूप ज्योति के प्रकाश से ब्रह्म रूप परमधन४ सर्वत्र भासने लगता है ।
राघवदास जी कहते हैं- जिसकी वाणी को सुनने और विचारने५ से ज्ञान६ होता है, उसकी वाणी को अवश्य विचारना चाहिये । कारण-परमार्थ रूप नीति पूर्ण वाणी के विचारे बिना धर्म का पालन नहीं हो पाता है । भक्तमाल रूप वाणी भी ऐसी ही होगी अतः अवश्य विचारने योग्य ही होगी ।
(क्रमशः)

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