मंगलवार, 15 सितंबर 2020

*६. जरणां कौ अंग ~ ३२/३४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*६. जरणां कौ अंग ~ ३२/३४*
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भरै नहीं तेता झरै, सुरति भरै तहां जाइ ।
जगजीवन पीवै प्रेम रस, अमर होइ गुण गाइ ॥३२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जितना भरता नहीं उतना समायी न होने से हम प्रकट कर देते हैं । जो रहता भी है तो वह ध्यान से ही रहता है । और जो प्रभु का ध्यान करते हैं वे प्रेम पी कर अमर होजाते हैं ।
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अलख जरै अबिगत भरै, अनहद करै अगाध ।
कहि जगजीवनदास तहँ, सुरति थंभै ते साध ॥३३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वह न दिखने पर भी परमात्मा हममें समाया है, हमें अनाहत नाद का अनुभव कराते हैं । वहाँ जिनका ध्यान लगा है संत कहते हैं वे ही सुदृढ हैं ।
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रांम ह्रिदै हरि भगति करि, सबद जरै सब ठांम । 
कहि जगजीवन प्रेम रस, नूर पिवै भजि नांम४ ॥३४॥
४. महात्मा जगजीवनदासजी ने इस अंग का व्याख्यान श्रीदादूवाणी एवं योगशास्त्र के लययोग का आश्रय लेकर किया है । अतः जिस जिज्ञासु को इसका वास्तविक रसास्वाद करना हो तो उसे पहले गुरुमुख से श्रीदादूवाणी एवं योगशास्त्र का श्रवण कर, उसका दृढ अभ्यास कर लेना चाहिये । केवल शब्दार्थ से प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा । - सम्पादक 
इति जरणां कौ अंग संपूर्ण ॥६॥
(क्रमशः)

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