सोमवार, 14 सितंबर 2020

*६. जरणां कौ अंग ~ २९/३१*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*६. जरणां कौ अंग ~ २९/३१*
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कहि जगजीवन नांम भजि, तजिए सब आरंभ१ ।
अैसा होइए रांम रटि, जैसा सिंभू२ स्यंभ३ ॥२९॥
(१. आरंभ - सांसारिक कर्म) {२. सिंभू - शंकर(=महादेव)} {३. स्यंभ - स्वयम्भू(स्वयम् उत्पन्न)} 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सब कुछ जो हमने शुरु किया है को छोड़कर राम नाम भजें और वह भी शिव समान सुन्दर हो निर्विकार हो जैसा एकाग्रता से स्वयं शिव ध्यान करते हैं ।
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कहि जगजीवन गाजर मूली, बीरज नांम जमाइ ।
हरि जल सींच हर्या रहे, सतगुरु मांहि समाइ ॥३०॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसे बीज रुप के आधार पर हम गाजर मूली ये भिन्न प्रतीकात्मक नाम रख देते हैं किंतु उसे हरा रखने वाला तो प्रभु है जो अतंर में समाया है ।
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प्रिथवी रज अरु रवि किरण, सोखै पोखै नीर ।
कहि जगजीवन रितु समै, सकल हर्या करि सीर ॥३१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पृथ्वी की आर्द्रता जल व धूल सोख लेते हैं । किन्तु समय या ऋतु आने पर परमात्मा उसे फिर हरा कर देते हैं ।
(क्रमशः)

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