सोमवार, 7 सितंबर 2020

विचार का अंग १०/१३

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🌷
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ विचार का अंग १०/१३)
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*दादू एक विचार सौं, सब तैं न्यारा होइ ।*
*मांहि है पर मन नहीं, सहज निरंजन सोइ ॥१०॥*
विचारशील मनुष्य संसार का विचार करके संसार की असारता को जानकर संसार में रहता हुआ भी ब्रह्मचिन्तन के द्वारा अनायास ही मुक्त हो जाता है । 
वासिष्ठ में लिखा है कि- “शास्त्रों के बोध से परम पवित्र बुद्धि के द्वारा कारण को जानने वाले पुरुष को आत्मा का विचार दिनरात करते रहना चाहिये । विचार से बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है और उस परम पद को प्राप्त कर लेती है । इस लम्बे संसार रूपी रोग की एक विचार ही महान् औषधि है । बुद्धिमान् मनुष्यों के लिये विचार को छोड़कर और कोई दूसरा उपाय नहीं है । अतः विचार के द्वारा सत्पुरुषों की बुद्धि अशुभ को त्याग कर शुभकर्म करने लगती है ।” 
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*दादू गुण निर्गुण मन मिल रह्या, क्यों बेगर ह्वै जाहि ।*
*जहँ मन नांही सो नहीं, जहँ मन चेतन सो आहि ॥११॥*
दैवी-गुणहीन सांसारिक विषयों में आसक्त हुए साधक का मन परमात्मा में कैसे लगे ? अतः श्रीदादूजी कह रहे हैं-
“मन को जो वस्तु प्रिय होती है, मन वहीँ पर बार-बार जाता है । अतः वैराग्य और विचार द्वारा विषयों में दोषदृष्टि से मन को प्रत्याहार द्वारा परमात्मा में लगाना चाहिये ।” 
वासिष्ठ में- स्वर्ग और मनुष्यलोक के जितने भी पदार्थ हैं, वे नाशवान् हैं । अतः जैसे मृगतृष्णिका के पानी में सुख नहीं, उसी प्रकार संसार के समस्त पदार्थों में भी सुख नहीं । अतः सम, संतोष आदि साधनों से मन को जीतना चाहिये । जिससे अनन्त परमात्मा में मन के संयोग से आनन्द की प्राप्ति हो जाये । मन की शान्ति से उत्पन्न होने वाला परम सुख विवेकरूपी व कल्पवृक्ष का खिला हुआ फूल है ।
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*दादू सबही व्याधि की, औषधि एक विचार ।*
*समझे तैं सुख पाइये, कोइ कुछ कहो गँवार ॥१२॥*
जन्म मरणरूपी सब ही रोगों की एक विचार ही महान् औषधि है । क्योंकि अपनी आत्मा का विचार किये बिना ही अज्ञानी अपना जन्म मरण मानता है । 
वासिष्ठ में लिखा है- “जितने भी अपने को तथा पराये को दुःख देने वाले कर्म तथा निषिद्ध आचरण हैं, वे सब अविचार से ही पैदा होते हैं, जैसे अंधकर में वेताल की मिथ्या प्रतीति होती है । विचारवान् का मन आशा के अधीन नहीं होता और परम विश्रान्ति को प्राप्त हो जाता है । जैसे पूर्ण चन्द्रमा के प्रकाश में शान्ति मिलती है ।”
यदि विवेकपना आ जाय तो शरीर में मन आदि सभी को शान्ति प्रदान कर देता है । जैसे चन्द्रमा की चांदनी गरम जल को शीतल कर देती है तथा प्यास से दुःखी को तृप्त कर देती है, जैसे राजा के सफेद महल पर राजचिन्ह के रूप में पताका लहराती है, उसी प्रकार ज्ञान के अधिकारी पुरुष की शुद्ध बुद्धिरूप पताका परमार्थ प्राप्तिरूप राजमहल पर सुशोभित होती है । यह जीव विचार से ही जीवन्मुक्त होकर बहुत से प्राणियों को ज्ञान का प्रकाश देकर संसार के भय को नष्ट करता हुआ सब दिशाओं में सुशोभित होता है । जैसे सूर्य सब दिशाओं के अन्धकार को दूर करता हुआ सुशोभित होता है ।
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दादू इक निर्गुण इक गुणमयी, सब घट ये द्वै ज्ञान ।
काया का माया मिले, आतम ब्रह्म समान ॥१३॥
प्रायः संसार में देहादिगुणों में अध्यास करने वाले प्राणी बहुत हैं । अतः वे संसार में आसक्त होकर जन्मते मरते रहते हैं । जो निर्गुण ब्रह्म को जानने वाले ज्ञानी महात्मा हैं, वे तो ब्रह्मरूप होने से इस संसार में मायाकृत गुणों में नहीं बंधते । 
वासिष्ठ में- “आत्मा का साक्षात्कार करने वाले बुद्धिमान महान् पुरुष इस संसार में साम्राज्य को प्राप्त किये हुए की तरह विचरण करते हैं । न वे शोक करते, न वे कुछ चाहते, न शुभ को चाहते, न अशुभ को त्यागता । सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करते । न उनके साधनों की याचना करते । असंग आत्मा का दर्शन करने से सदा स्वच्छ(निर्लिप्त) रहते हैं । शास्त्रीय कर्म को करते हैं और लौकिक सन्मार्ग पर चलते हैं । उनके लिये हेय, उपादेय, तथा ग्राह्य कुछ नहीं है । वे अपनी आत्मा में सदा स्थिर रहते हैं ।” 
(क्रमशः)

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