बुधवार, 2 सितंबर 2020

= ३६२ =

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग सूहा २२(गायन समय दिन ९ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**काया बेली ग्रन्थ**
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३६२ - राज विद्याधर तालकाया मांहीं तारणहार,
काया मांहीं उतरे पार ।
काया मांहीं दूस्तर तारे,
काया मांहीं आप उबारे ॥१॥
काया मांहीं दूस्तर तिरे,
काया मांहीं होइ उद्धरे ।
काया मांहीं निपजै आइ,
काया मांहीं रहे समाइ ॥२॥
काया मांहीं खुले कपाट,
काया मांहीं निरंजन हाट ।
काया मांहीं है दीदार,
काया मांहीं देखणहार ॥३॥
काया मांहीं राम रंग राते,
काया मांहीं प्रेम रस माते ।
काया मांहीं अविचल भये,
काया मांहीं निश्चल रहे ॥४॥
काया मांहीं जीवै जीव,
काया मांहीं पाया पीव ।
काया मांहीं सदा अनँद,
काया मांहीं परमानँद ॥५॥
काया मांहीं कुशल है,
सो हम देख्या आइ ।
दादू गुरुमुख पाइये,
साधु कहैं समझाइ ॥६॥
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**= काया माँहीं तारणहार =**
सँसार सिन्धु से तारने वाला परमात्मा आत्मरूप से काया में है ।
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**= काया माँहीं उतरे पार =**
साधक काया में रहते हुये ही भक्ति - ज्ञानादि द्वारा सँसार के पार गये हैं ।
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**= काया माँहीं दूस्तर तारे =**
काया में रहते ही साधक वैराग्यादि साधन द्वारा अपने को दूस्तर भोगाशा से तारता है ।
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**= काया माँहीं आप उबारे =**
काया में रहते ही साधन द्वारा जीवात्मा स्वयँ ही अपना पतन से उद्धार करता है ।
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**= काया माँहीं दूस्तर तिरे =**
काया में रहते हुये ही ईश्वर कृपा से साधक दूस्तर काम - क्रोधादि से तिरे हैँ ।
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**= काया माँहीं होइ उद्धरे =**
पूर्व काल के साधक मनुष्य शरीर में ही हरि में अनुरक्त होकर मुक्त हुये हैं ।
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**= काया मांहीं निपजै आइ =**
विषयों से लौटकर मन साधन मेँ आता है, तब शरीर में ही ज्ञानादि उत्पन्न होते हैं ।
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**= काया माँहीं रहे समाइ =**
ज्ञानादि की उत्पत्ति के अनन्तर शरीरस्थ चेतन में ही वृत्ति समाई रहती है ।
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**= काया माँहीं खुले कपाट =**
पूर्व कालीन साधकों के अज्ञान कपाट काया में रहते ही खुले हैं ।
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**= काया मांहीं निरंजन हाट =**
निरंजन ब्रह्म वस्तु को प्राप्त करने योग्य निर्विकल्प समाधि रूप हाट भी काया में ही है ।
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**= काया मांहीं है दीदार =**
काया में ही ब्रह्म का साक्षात्कार होता है ।
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**= काया माँहीं देखणहार =**
ब्रह्म साक्षात्कार करने वाला जीवात्मा भी काया में ही है ।
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**= काया माँहीं राम रंग राते =**
भक्त जन राम - भक्ति – रँग में अनुरक्त भी काया में रहते ही होते हैं ।
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**= काया माँहीं प्रेम रस माते =**
काया में रहते हुये ही सँत प्रभु - प्रेम में मस्त होते हैं ।
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**= काया माँहीं अविचल भये =**
शरीर रहते हुये ही साधकों के मन, बुद्धि आदि स्थिर हुये हैं ।
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**= काया माँहीं निश्चल रहे =**
काया में रहते हुये ही सँत निश्चल ब्रह्म में लीन रहे हैं ।
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**= काया माँहीं जीवै जीव =**
काया में ही जीव जीवित कहलाता है ।
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**= काया माँहीं पाया पीव =**
सँतों ने काया में ही प्रभु को प्राप्त किया है ।
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**= काया माँहीं सदा अनँद =**
पदार्थ प्राप्ति जन्य आनन्द सदा काया में ही मिलता है ।
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**= काया माँहीं परमानन्द =**
ब्रह्म प्राप्ति जन्य परमानन्द भी काया में ही मिलता है ।
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**= काया माँही कुशल है, सो हम देख्या आइ =**
काया में जो ब्रह्मानन्द प्राप्त होता है, वह हमने समाधि अवस्था में आकर प्रत्यक्ष अनुभव किया है ।
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**= दादू गुरु मुख पाइये, साधु कहैं समझाइ =**
वह ब्रह्मानँद गुरुमुख से उपदेश श्रवण करके मनन, निदिध्यासन द्वारा प्राप्त किया जाता है, ऐसा ही सँतजन समझा - समझा कर कहते रहते हैं ।
(क्रमशः)

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