🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*सोई बड़भागी सदा सुहागी,*
*परगट प्रीतम संग भये ।*
*दादू भाग बड़े वर वर कर,*
*सो अजरावर जीत गये ॥*
=================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
.
रज्जब बाजी वक्त१ की, माँगे मिल हि सु डाव२ ।
रंक राव व्है पलक में, सब सिध३ प्रभु पसाव४ ॥५३॥
समय१ की बाजी में मुँह माँगा सुन्दर दाँव२ प्राप्त होता है और कंगाल एक क्षण में हुमा पक्षी की छाया पड़ने पर राजा हो जाता है, वैसे ही प्रभु के अनुग्रह४ से सब कुछ ही सिद्ध३ हो जाता है ।
.
भाग्य भले भगवंतहि गावै,
वक्त१ बड़े जो ब्रह्म सुहावै ।
रति२ सु उति३ महरि४ रत होय,
ता५ सम६ तुल्य और नहिं कोय ॥५४॥
जो भगवान के नाम और यश का गान करता है उसके अच्छे भाग्य हैं जिसको ब्रह्म प्रिय लगता है वही अपने समय१ में महान है । प्रीति२ उतनी३ ही अच्छी है, जिससे नारी४ अनुरक्त रहे, नारी में आसक्त होना अच्छा नहीं उक्त तीनों लक्षण जिसमें हैं उसके५ समान६ वही है, उसके बराबर अन्य कोई भी नहीं हो सकता ।
.
सदगुरु साधू घट१ घटा, शिव सारंग२ पुकार ।
बैन बूंद वर्षा विपुल३, पै भाग्य परै मुख धार ॥५५॥
चातक१ पक्षी की पुकार से बादलों की धटा से बहुत२ बिन्दु वर्षती है किन्तु जो उसके भाग्य में होती है उन बिन्दुओं की ही धारा चातक के मुख में पड़ती है, वैसे ही शिष्य के प्रश्न पर श्रेष्ठ गुरु वा सदगुरु और संतो के शरीर३ के मुख से बहुत वचन निकलते हैं किन्तु शिष्य के अंत:करण में तो उसके भाग्य के अनुसार ही ठहर पाते हैं ।
.
श्वान१ सुखासन२ चढि चलै, सही३ सु सीरा खांहिं ।
रज्जब ओढें सावटू४, लिख्या सु भाग हु माहिं ॥५६॥
कुत्ते१ पालकी२ पर बैठ कर चलते हैं, यह भी सत्य३ है, सीरा खाते हैं और सुन्दर वस्त्र४ ओढते हैं, कारण - उनके भाग्य में लिखा है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें