रविवार, 20 सितंबर 2020

*७. हैरान कौ अंग ~ १७/२०*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*७. हैरान कौ अंग ~ १७/२०*
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रांम कह्यां बिन को लहै, आदि अंत मधि एह ।
कहि जगजीवन सोध तन, अनहद देह बिदेह ॥१७॥
संतजगजीवन कहते हैं कि राम कहे बिना कौन आदि मध्य अंत की थाह पा सकता है । वे प्रभु तो अनाहद ध्वनि की तरह विदेह ही हैं ।
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कहि जगजीवन कह्या नहीं, क्यों करि कहिये ताहि ।
कोई कछु कहै सु कह्या कहै, बावन अक्षर मांहि ॥१८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा वर्णन से परे है उसे कैसे व क्यों कहा जाय वह तो श्रद्धा व विश्वास का भाव है । वर्णमाला के बावन अक्षर हैं आप उनका प्रयोग प्रभु के लिए जो कहना चाहें कहने के लिये स्वतंत्र हैं । 
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अनंत रूप धरि अनंत गुण, अनंत कहै मिलि कंत ।
कहि जगजीवन अनंत गति, अनंत चरित्र नहीं अंत ॥१९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु के अनंत रुप व गुण हैं और अनंत ने उन अनंतप्रिय के लिये अनंत ही कहा है । उनकी अनंत लीलाओं के अनंत चरित्र हैं जिनका कोइ अंत नहीं है ।
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रांम भजै नित रांम सौं, अगम तिरै वो रांम ।
कहि जगजीवन साध सब, अगम कहै ए रांम ॥२०॥ 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो राम जपते हैं राम आधार लेकर वे भव पार होते हैं । सब साधु जन राम कह कर ही पार हुये व राम ही कहते हैं उनका आलम्बन राम ही है ।
(क्रमशः)

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