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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्थोल्लास” ४३/४५)*
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*बाग सत्संग से बैकुठ बन गया*
*साधू वृन्द करैं तहां ज्ञान,*
*वन्यूं बाग बैकुण्ठ समान ।*
*हेला हेली बोली भारी,*
*दादूराम सब कहें पुकारी ॥४३॥*
साधु संत समूह वहां ब्रह्म ज्ञान की चर्चा संगति करते हैं यह बाग साधु सत्संग के कारण वैकुंठ बना हुआ है । सब लोग आपस में संगीतमय प्रश्नोत्तर आपस में करते हैं सब दादूराम दादूराम पुकारते हैं ॥४३॥
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*पाट पटंवर माधि बिछाये,*
*दर्सन देखि बहुत सुख पाये ।*
*अरु बहुतेरे ल्यावे वागा,*
*करै बिछाइति ही सब जागा ॥४४॥*
बाग के मार्ग पर तरह तरह के वस्त्र अगवानी के रूप में बिछाये गये हैं संतों के दर्शन कर जनता बहुत सुख प्राप्त करती है । अन्य लोग भी बाग में बिछाइत के वस्त्र ला रहे हैं और सब जगह वस्त्र बिछा रहे हैं ॥४४॥
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*चारुँ वर्ण सत्संग में आते हैं*
*चार्यूं वर्ण भेद नहीं कोई,*
*दादूराम कहे सब कोई ।*
*माली जैसे सींच बनवारी,*
*पंहुचे पोष सबे तरु डारी ॥४५॥*
वहां चारो वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र इनमें कोई भेद नही है ऊंच नीच का सब बराबर है । सभी लोग श्रद्घा के साथ दादूराम का कीर्तन करते हैं । जिस प्रकार माली अपने वृक्षों व बाड़ी को सींचता है तो वृक्ष की सभी शाखाओं का पोषण होता है । इसी प्रकार संत के वचनों से सभी ज्ञान प्राप्त करते थे ॥४५॥
(क्रमशः)

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