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*मन ही सौं मन सेविये, ज्यौं जल जलहि समाइ ।*
*आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ लय का अंग)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
*साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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*ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं*
“ज्ञानी ब्रह्म को जानना चाहता है । भक्त के लिए भगवान् – सर्वशक्तिमान् षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् हैं । परन्तु वास्तव में ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं । जो सच्चिदानन्दमय हैं वे ही सच्चिदानन्दमयी हैं । जैसे मणि और उसकी ज्योति । मणि की ज्योति कहने से ही मणि का बोध होता है और मणि कहने से ही उसकी ज्योति का । बिना मणि को सोचे उसकी ज्योति की धारणा नहीं हो सकती, वैसे ही बिना मणि की ज्योति को सोचे मणि को भी सोचा नहीं जा सकता ।
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“एक ही सच्चिदानन्द का शक्ति का भेद से उपाधिभेद होता है । इसलिए उनके विविध रूप होते हैं । ‘तारा, वह तो तुम्हीं हो ।’ जहाँ कहीं कार्य(सृष्टि, स्थिति, प्रलय) हैं वहीँ शक्ति है । परन्तु जल स्थिर रहने पर भी जल है और हिलोरें, बुलबुले आदि उठने पर भी जल ही है । सच्चिदानन्द से आद्याशक्ति हैं – जो सृष्टि, स्थिति, प्रलय करती हैं जैसे कप्तान जब कोई काम नहीं करते तब भी वही हैं, जब पूजा करते हैं तब भी वही हैं, और जब वे लाटसाहब के पास जाते हैं तब भी वही हैं, केवल उपाधि का भेद है ।”
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कप्तान- जी हाँ ।
श्रीरामकृष्ण- मैंने यही बात केशव सेन से कही थी ।
कप्तान- केशव सेन भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचार हैं; वे बाबू हैं, साधु नहीं ।
श्रीरामकृष्ण(भक्तों से)- कप्तान मुझे केशव सेन के यहाँ जाने को मना करता है ।
कप्तान- महाराज, आप तो जाएँगे ही, भला उस पर मैं क्या करूँ ?
श्रीरामकृष्ण(नाराज होकर)- तुम लाटसाहब के पास रुपये के लिए जा सकते हो, और मैं केशव सेन के पास नहीं जा सकता ? वह तो ईश्वरचिन्तन करता है, हरि का नाम लेता है । इधर तुम्हीं तो कहते हो, ‘ईश्वर ही अपनी माया से जीव और जगत् हुए हैं ।’
(क्रमशः)

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